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राजस्थान रा जिला रो नक्शो
(आभार राजस्थान पत्रिका)

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परमार्थ विचार

(94)
"राग, रोष; इर्षा, मद, मोह।
जनि सपनेहु इनके वश हांउ।"
--श्री मानस
वर्ताव में लावा रा नियम।

(1) हरे'क काम पूर्ण विचार, आपणा बुद्धिमान शुभचिन्तकां ने पूछ, पक्ष दुराग्रह (हठ) ने छोड, शीघ्र ही आरम्भ कर देणो।
(2) लोभ शूं कार्य रा अवगुण दृष्टि नी आवे है, ईं शूं जो कार्य आरम्भ करमओ, व्हे' शके तो वींरा गुण अवगुण एक पाना पे न्यारा न्यारा लिख तारतम्य देख दृढ़ता शूं करणो।
(3) जो कोई अन्य प्रबल कारण शूं नियम भंग व्हे' जाय तो वीं रो वींज अनुसार प्रायश्चित कर काढ़णो।
(4) निषिद्ध कार्य प्राणान्त (मरण) व्हे' तो भी नी करणो।
(5) आपणा अवगुण पारस भाग शूं जाण छोड़वा में तत्पर व्हे'णो।
(6) मनुष्य मात्र री भलाई निस्संकल्प (कामना रहित) भक्तियुक्त ईश्वर स्मरण में है।
(7) जी विशेष अवगुण व्हे' वांरी याददास्त लिख लेणी।
(8) विना विचार वनय उच्चारण व्हे' सो त्यागणा।
(9) क्रोध री उत्पत्ति सहज में व्हे' सो त्यागणी।
(10) कणी पण स्त्री रो दर्शण, स्मरण सकाम (बुरी भावना राखने) नी करणो।
(11) भजन रा नियम, एकान्त सेवन में आलस्य वा मन छल में आय, नी छोड़णो दृढ़ता शूं निर्वाह करणो।
(12) समय'ने दृव्य रा खर्च रो उचित प्रबन्ध करणो।
(13) पुस्तक, वांचवा शूं भी समझणी ज्यादा।
(14) मृत्यु शूं भय नी करणो, ईश्वर री इच्छा में प्रसन्न रेणो, दुःख मिटावा रो उपाय करणो, परन्तु दुःख मिटावा री इच्छा नी करणी, (क्यूंके इच्छा शूं दुःख ऊपजे)
(15) समय बांधने वीं समय री वात वणीज समय विचारणी, विचार संकर नी व्हे'णो (अनेक विचार नी करणा) अवश्य संसारी व्यवहार में ईश्वरीय विचार राखणो पण ईश्वरीय विचार में कदापि संसारी विचार नी आवा देणो। (यो अभ्यास) दृढ़ता शूं करणो।
(16) अति भोजन (ज्यादा खावा) शूं विचार उत्तम नी व्हे'। अल्प (थोड़ा) शूं शरीर ठीक नी रे' सो समान (अंदाज रो) भोजन करणो। आछी चीज व्हे' तो ज्यादा नी, खाणी, परिणाम शूं खाणी। फेर पाचन रो भी विचारणो। क्यूंके नी पचे सो ही ज्यादा, ने पच जाय सो ही ठीक है।
(17) अहङ्कार नी करणओ, ज्यादा बोलवो भी अहङ्कार शूं व्हे' ने नी बोलवो भी अहंकार शूं व्हे'। पुस्तकां छपावणओ वा वणाय ने शुणावणो आदि सूक्ष्म अहंकार अठा तक व्हे' के म्हने अहंकार नी है, ईं' रो पण अहंकार व्हे' जाय है।
(18) परमारथ विचार पे'ला भाग राई लेख याद राखणा 3-7-18-27-28-31-32-33-37-45-48-57-58-61।

भाग-2

(1)
वीजणवास में श्याम भुजंग आय भींत नख बेठो, सो पाछे आय डील रे अटक्यो, जदी विचार व्हियो कओी फड़को दीखे, पण जदी वमी खोलां में आवा री कोशीश कीधी, जदी भारी जाण ऊंदार को वा कोई अन्य जन्तु री भ्रम व्हियो, सो कुड़ता ने झटकावा लागी, फेर ऊठ ने देख्यो तो सांप है। अश्य समय में मनख री हुंश्यारी कई काम देवे। म्हूं, म्हांरी हुंश्यारमी शूं वींरे नखे (पास) हाथ ले जारयिो हो, ने ईश्वर हाथां ने छेटी रखाय रिया हा। मृत्यु शूं बचावा पै भी जो वींरो भजन नी करां, ने मिथ्यां में उलझां तो फेर दुःख व्हे' जदी पछतावो नी करमओ, ने नी प्रार्थना करणी चावे-
"विष री क्यारी बोय कर लुनतां क्यों पछताय"
वीं वगत म्हूं विचारियो हो के काले उदेपुर जावांगा। रोट्यांरी त्यारी रो रसोड़दार ने कियो, सो त्यार व्हे' ही गी है। अगर वो वीं समय काटतो तो कई पण नीं व्हे' तो, ईं शूं पे'ली विचार' ने पण मनख अनर्थ हीज करे है. मनुष्य अनेक प्रकार शं मर शके है, फरे तुच्छ जीवन रो कई विश्वास-
प्राप्तंप्राप्तमुपासीत हृदयेन व्यरुपता।
भारते
सामने आई थकी वातने करणी, आली नी विचारणी, यो भाव है।
(2)
शरीर में अहंकार री अनेक शीश्यां है। वणां में साफ जल भर्यो है। अब न्यारा रंग री डल्यां एक एक में लाल, पीली, हरी, काली, वगेरा न्हाकवा शूं शीशय्‌ां वीं वीं रंग री दीखे। वे, दो आदमी देवदत्त, यज्ञदत्त बैठा है। वां में देवदत्त ने गाल देवे, तो जी देवदत्त नाम पे ममता जमाई है, वो क्रोध करेगा दूसरो नी। क्यूंके यज्ञदत्त पे ममता जमाई है। कुछ दिन वांरा नाम पलट जाय, तो विपरीत व्हे' जाय। यूं हीं शरीर पै भी है। पण शरीर में ममता कर्मां शूं व्ही जी' शूं सहसा वीं पै शूं नीं हट शके, ज्यूं नाम पै शूं भी हटावा पै वीं नाम लेवा शूं चित्त सहसा वठी चल्यो जाय।

(3)
'अहं' माने है के (म्हूं), दृष्ट (दीखवा वाली) वस्तु नी हूं (पण दृष्टा हूं) तो यूं क्यूं विचारणो के म्हारे लागी, म्हूं रुपालो हूं, म्हारी स्तुति व्ही' म्हूीं वठे गियो, ने यो कीदो। शरीर तो रेल ज्यूं है, जीने कुछ भी ज्ञान नी है। अंजन चाले सो जल, अग्नि वगेरा शूं चाले, पण ड्राईवर कल फेरे जदी चाले। ड्राइवर विना वो नी चाले ने खाली ड्राइवर शूं पण नी चाले, जल आदि शूं पण चाले। पण छेटी बेठो बेठो मास्टर तार खटकावे सो बहुत ठेरी रा टेशण पै भी खटके, यूं ही मास्टर ईश्वर है, ड्राइवर जीप है, अंजन शरीर है, ने तार वृत्ति है।
(4)
अहंकार सब में है, शरीर पे सब रो प्रेम है, स्त्री पुत्र आदि सब ने प्रिय है, यूं ही सब प्राकृत, सब (दीखती दुनियां) है। ईं शूं 'अहं' पण जड़ व्हियो। क्यूंके आपां में ही विशेष नी है। सब सामान्य में पण है, या सब एक रुप है।
"मैं मेरो तेरो तुही, तेरो मेरो हीन।
श्री राधा घनश्याम की लीला नित्या नवीन।"
--निजकृत

(5)
गाड़ा री धुर (नाभि) आरा आदि फिरवा शूं सब फिरे, पण वच्चे खीलो नी फिरतो भी फिरतो दीखे, यूं माया शूं ईश्वर में भ्रम व्हे' (ईश्वर खीलारे समान ने माया पेड़ो है।)
(6)
दृष्टा, (देखवा वालो) दर्शन, (देखणो) दृश्य, (दीखवा वालो) कारण, करण, कार्य सब ें है। प्रत्यक्ष प्रमाण में करण इन्द्रियां, कार्य घट, कारण मन, ईं तरे शूं सब रो कारण ईश्वर है, याने दर्शन कई वस्तु है ? दर्शन री सिद्धि जींशूं व्हे' वो ईश्वर। दर्शन कणी प्रमाण शूं सिद्ध व्हे'। क्यूंके दर्शन शूँ दृश्य सिद्ध व्हे'। वो कीं शूँ सिद्ध व्हे वींरो (दर्शन) कई रुव व्हियो ?
दर्शन छः है। बस दर्शन रो दर्शन कराव शूं सब दर्शन रो तत्व समझ में आवेगा, वा दृष्टा रो ने दृष्य रो मतलब भी विचार में आवेगा। ईं सूं दर्शन ही विचारणो चावे।

(7)
इच्छा मात्र प्रभो सृष्टिः
"भगवान री इच्छा ही सृष्टि है"
सब ईश्वर री इच्छा है। ईश्वर री इच्छा बुद्धि ईश्वर री इच्छा अहं', ईश्वर री इच्छा मन, यूं ही पञ्च भूत आदि, सब सत्वादि कारम कार्य ईश्वर री इच्छा है। इच्छा, इच्छावान शूं न्यांरी पण है। ज्यूं मनुष्य री कोई इच्छा नाम व्हेवा शूं मनुष्य रो नाश नी व्हे, ने इच्छा विना इच्छावान् रे इच्छा रेवे पण नी। वास्तव में इच्छा रो कई भी रुप नी, इच्छा सूं हीज इच्छावान रो अस्तित्व सिद्ध व्हे'।
प्रश्न- इ्‌चछा दीखे क्यूं है ?
उत्तर- ईश्वर सत्य संकल्प है, जी शूँ। मनुष्य पण जदी मेस-मेरिजम शूं वाग, तलाव आदि विना व्हियाँ देखया देवे। हरेक स्वप्न में अनेक पदार्थ दीखे। वास्तव में वो हीज निज इच्छा ने देश रियो है और वीं री इच्छा शूँ ही जड़ 'अहं' जाणे देख रियो है। यो 'अहं' ही मुख्य कपाट ईश्वर जीव रे वच्चे है। अणी न्यारा न्यारा कीधा है। स्वप्न जाग्रतादि सब वो ही देखे। यो मूर्ख (अहंकार) वच्चे ही आय देखवा रो अभिमान करे-
अहङ्कारविमूढात्मा कतहिमतििमन्यते।
नैव किञ्चित्करीमीति युक्तं मन्येत तत्ववित्‌।।
--श्री गीता
बड़ा राजा रे मूँडा आगे सेवक केवे 'ताबेदार हाजर व्हियो, ताबेदार फलाणी जगा गियो. पण म्हूँ (अहँ) नी आवे दे।' क्यूँके राजा रे आगे म्हूँ (अहँ) कई चीज है। वो सेवक आपने पराधीन जाणे, ईं शूँ ताबेदरा गियो ादि अस्यो प्रयोग करे के आपणी सत्ता जणा में कुछ नी व्हे'। पण यो जड़ जीव परमेशर रे मूँडा आगे अहङ्कार करे, ने आपरी न्यारी ही सत्ता माने, तो ईं ने दुःख मिलमओ उचित ही है, भारी गलती या ही है। जदी यो के' वे, के 'अहं' जदी ईश्वर रे मुंडा आगे ईं नालायकी रा कसूर शूं यो बँधावा री सजा पावे। जदी के'वे नाऽहं' (म्हूं तो कई नी हूं) जदी छोड़वा रो इनाम पावे।

(8)
आत्म समर्पण रो विचार ही भक्ति है। क्यू के विना भक्ति ईश्वर प्राप्ति कठिन है। सख्यादि सब भक्ति में आत्म समर्पण करणो पड़े। वात्सल्य में ज्यूं दशरथजी महाराज आत्म समर्पण कर्यो, यूं ही आत्मा ने अलग राख, प्रेम करे, वो संसारी प्रेमवत् व्हे' जाय। ज्यूं संसारी आपणी आत्मा रे वास्ते पुत्रादि पै प्रेम करे, पण अबे ईश्वर रे वास्ते आत्मा है, वो आपमए वास्ते कुछ, भी नी चावे। ज्यूं श्री बृज गोपिका "आपरे वन में कोमल चरण में कण्टक लागता व्हे'गा, यो दुःख है" इत्यादि भक्त रा अेक वचन है।
(9)
वासना रहित व्हे'णो मोक्ष है। वासना युक्,त मनख जंगल में, एकान्त में भी बंध्यो है, ने ईंशूं रहित शभा में भी मुक्त है। वासना है, केनी ईंरी परीक्या या है, के झट झट नाम स्मरण अन्तः करण में करणो, जदी नाम रे वच्चे वच्चे विचार पैदा व्हे' यो वासना रो हीज कारम है। पण नाम में बड़ी सामर्थ्य है, यो वासना पिशाचिनी ने नाश कर देवे है-
"सहज उपाय पाय वे केरे
नर हत भाग देइ भट भेंरे"
--मानस
वर्षाणे एक पण्डितजी मिल्या, वीं जप करता हा, वणा कियो के अबे ईंशूं (जप शूं) म्हारी वासना नष्ट व्हे' उदासीन वृत्ति व्हे' गई है।
(10)

परमारथ विचार रो सार यो है, के नाम स्मरण जश्यो तो कोई सरल उत्तम साधन नी, ने भक्ति समान सिद्धि नी। ईं रो ज्यादा लिखवा में विस्तार रो भय है, ने जगा जगा लिख्यो पण है, तो भी मन ने समझावा ताबे जश्यो कुछ विचार व्हिोय, फेर कुछ लिखूँ हूँ। साधन रो यो नियम, है स्तूल शूंँ सूक्ष्म देश ने प्राप्त करमओ, कारण स्थूल में स्वाभाविक ही प्रवृत्ति है। ईं शूं एक ा एक शूक्ष्म री प्राप्ति नीं व्हे' शके। पूर्व संस्कार वा जन्म सिद्ध री वात न्यारी है। यो दो प्रकार रो व्हे' है, एक में पूर्व साधन रो त्याग, ने पर रो (दूजारो) ग्रहण। ज्यूं हठ योग शूं मन्त्र, लय, लय शूं राजयोग, एक अश्यो के ज्यूं वेदान्त रो विचार। या प्रारम्भ ही में राजयोग। पर नाम स्मरण अस्यो है, के ईं में जो प्रारम्भ करयो जाय, वो ही ठेठ तक पहुंचाय देवे याने वाही पर अवश्था है। ज्यूं सड़क एक असी व्हे', जठे पलट पलट, ने मुकाम पे पौंछे, ज्यूं रेल ने चेञ्च करणी (बदलणी) पड़े। एक शूदी थ्रू ट्रेन व्हे' जी में वीं ने छोड़वा री आवश्यकता नी पड़े। हाँ, मुख शूँ, जिव्हा शूं, कण्ठादि देस शूं, वा मन बुद्धि सूुं जरुर भेद दीखे है, पम मन ही मुख्य कारम है।

जणी मनख रो बोलवा में मन लागे, वो वोल ने करे तो स्मरण व्हे' ही रियो है। जीं रो बोववा सिवाय मन और जगा जाय, वीं ने मन में करणो चावे. बुद्धि शूं स्मरण व्हे' रियो हैष वो ने ब्रह्म साक्षात्कार में कोई भेद नी है। केवल सविकल्प निर्विकल्प रो भेद दीखे है, सो भी स्वतः निर्विकलप्ता ने प्राप्त व्हे' जाय है, याने स्मरण शूं मतलब यो है, के सुरति नाम में लागि रेवे। ब्रह्मसाक्षात्कार पण यो ही है। ब्राह्मकार चित्त री वृत्ति व्हेवे, ईंमें विशेषता या है, के चित्त री चञ्चलता शक्ति जो कणी भी साधन शूं नाश नी व्हे' ईं शूं सहज में वा नष्ट व्हे' जाय, ने दूसरा साधन में जो बार बार प्रश्न उछे, वीं ईं शूं नी व्हेवे। किन्तु निश्चय व्हे' जावे। श्री करुणा निधान आज्ञा करे है, के-
"अननन्यचेताः सतंत यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।।"
--श्री गीता
याने नाम ही ने सर्वस्व समझ निरन्तर स्मरण करे वीं ने ब्रह्म ज्ञान री आवश्यकता नी। क्यूं के ज्ञान शूं ईश्वर दुर्लभ है। कारण स्थूल वृत्ति चित्त री व्हेवा शूं ब्रह्म रो साक्षात्कार वृत्ति नी करसके। क्यूं के वशी (ब्रह्म जशी) कोई वस्तु हाल ईंनी देखी सो वीं ने यो किस तरे' जाण शके, तो यो विपरती निश्चय कर बैठेगा। या तो शून्य ने ही ब्रह्म मान लेगा, या ब्रह्म ने विचारताँ विचारताँ खुद शून्य व्हे' जाय इत्यादि अनेक विध्न ईं ने प्राप्त व्हेगा,स पर नाम शू ंसहज ही यथार्थ ब्रह्म ज्ञान ईंने व्हे' जायेगा, सो ही योग सूत्र में लिख्यो है। व्याधि आदि विघ्न नाम स्मरण शूं मिटे, ने समाधि री प्रापत्‌ि व्हे। ज्यूं कोई नाद ने ही ब्रह्म मान ले, कोई ज्योति ने ही मान बैठे, सो वास्तविक भान उपरोक्त श्लोकानुसार स्मरण शूं सहज में व्हे। ई श्री मुका वचन है और साधन कष्ट मय है, ने अल्प फल है। पण अश्यो ौर नी है। श्री भक्ति शूँ भी यो ही तात्पर्य है। भक्ति, नाम री चरमा-वस्था रो नाम है।

प्रश्न-भक्ति वा ज्ञान मं कोई अन्तर है ?
उत्तर-ज्ञान, भक्ति में कुछ भी अन्तर नी है-
मेरे प्रोढ़ तनय सम ज्ञानी
बालक सुत सम दास अमानी
दुहु दुहु काम क्रोध रिया आही
--श्री मानस
काम, क्रोध ने छोड़णो मुख्य है। भक्ति अशी है, जीं में धीरे धीरे काम, क्रोध छोड्या जाय, वा आप ही ईश्वर छुड़ाय देवे। कारण अहङ्कार प्रबल शत्रु है, ईं शूं ही काम क्रोध व्हे है। भक्ताँ ने सर्वदा या विचार व्हे' 'ज्यो व्हे ईश्वरेच्छा शूँ व्हे' अबे वणारो अहङ्कार कई करे, फेर मनुष्य शुरु में अश्यो फश्यो व्हे', के वो वैराग्य रा नाम शूँ ही नारज व्हे' वो वणीज अनुराग ने ईश्वरमें करवा शूँ परम पद ने प्राप्त व्हे' जावे। कतराही आदमी ज्ञान रा अधिकारी नी व्हे' है। क्यूँ के चार साधन (मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा) अवश्य अधिकारी में चावे, पण ईं में "मीठो दवा रोग ने मिटावे" जशी वात है, के ईश्वर या लीला कीधी, यूँ वाताँ करी, अश्यो ईश्वर, (जगतो यो जगच्चय) त्यिादि साथे साथे ही सहज में लौकिक प्रेम जो झूठ है असल (सत्य) व्हे जावे। मेघनाद ईश्वर ने नाग पाश में बांध्या वो मनुष्य भाव में इश्वर भाव है-
भव बन्धन ते छूट ही, नर जपि जा कर नाम।
खर्व निशाचर बाँधेऊ, नाग पाश सोई राम।।
--श्री मानस

खाली ज्ञानी, अज्ञान शूँ भी ज्यादा है। भक्ति शूँ ईश्वर रो सच्चिदानन्दपमो सहज में ज्ञात व्हे'। खाली ज्ञानी, आकाशदिवत् ईश्वर ने मान ले, क्यूँके बुद्धि शूँन्य रो मनन करवा लाग जाय।
प्रश्न-भक्ति कश्यो दर्शन है, दर्शन तो छे' शुण्या है ?
उत्तर-कोई सात दर्शन के'वे ने भक्ति ने सातमों दर्शन माने। म्हारी समझ में छ दर्शन रो निष्कर्ष भक्ति है। ईं ने समझावा में छहो दर्शन रो वर्णन करवा शूँ गौरव व्हे'गा, प्णपुराण ने विचारवा शूँ या वात समझ में आ शके है, जठे युगल स्वरूप रो वर्णन है, वठे प्रकृति पुरुष। एक ईस्वर री विशेषता है, वठे वेदान्त। यूँ ही सब समझणा।
(11)
एक व्यक्ति ने स्वप्न अणावा री युक्ति याद ही। वो दश दिन, पन्द्रा'दिन चावे जतरे, चावे जश्यो, स्वप्न राख शकतो हो। बस, ईश्वर ही वो व्यक्ति है, संसार ही स्वप्न है, वो चावे जतरे हीं (संसार) रेवे। यदि मनुष्य ाय विचार ले' के अबे स्वप्न आवेगा ने वो असत्य है, वीं में हर्ष शोक नी करणो चावे, यूं विचार ने शूवे, ने स्वप्न आवे जदी वी रा ही हर्ष, शोक, वीं ने व्हेवा लाग जाय। यूं ही ज्यो दृढ़ कर स्वप्न देखे वी ने नी पण व्हे' परन्तु बुद्धि या रेवे, यो स्वप्न है, जदी है।
(12)
थूं ज्यूं' म्हूं, ने म्हूं ज्यूं म्हूं, मतलब, ज्यूं ई वृत्त्यां है, ज्यूं म्हूं पण चित्त री वृत्ति है।
(13)
चित्त में अहं री अञ्चली पड़गी सो वार वार आय जाय ओशान राखने छोड़णी।
(14)
एक आदमी चायो सहब चीजां म्हने मिल जाय, एक बुद्धिमान लेम्प (दीवो) जोय आगे मे'ल, कियो ईं में सब है, अव्यवधान पणया पांच रोही पांच में पड़े है, वा शरीर में है, अर्थात् ईं में पांच ही तत्व शामिल व्हे' गया।

(15)
एक जिज्ञासू ने एक महात्मा पूछ्यो थूं कई चावे ? वीं कही, ईश्वर ने चाऊं हूं। वां कही, ईश्वर ने चावा री इच्छा एकली ही रे' है। अर्थात् और कई पण चाह नी रे'णी चावे। ईश्वर ने चावतां ही ईश्वर मिले, पण चाह रो हीज अभाव है। क्यूंके और पण संकल्प वच्चे वच्चे व्हे' सो चाह रो हीज कारण है।
(16)
स्थूल शरीर एक ही है। क्यूंके पांच भूतरो व्हेवा शं आकाश शूं पृथकता (न्यारा) नी व्हे। आकाश शूं न्यारा मावा शूं पेट में भी वो सर्वत्र व्यापक व्हेवा शूं सब ही न्यारा न्यारा व्हे' जायगा सो शरीर व्यक्ति ने ही न्यारा क्यूं मानणा। यूँ ही सूक्ष्म शरीर एक है, ज्यूं स्थूल में सिवाय आकाश न्यारो व्यवहार कई नी है, यूं ही सूक्ष्म ेक व्हेवा पर भी विचार ही पृथक् है। विचार पण सूक्ष्म शरीर शूं न्यारी नी, यूं ही कारण ईश्वर ब्रह्म। पेली पण या ही ज वात ौर तरे' शूं' कुछ फर्क शूं लिखी।
(17)
नाम स्मरण मानसिक करमओ, वणी वगत प्रतीक उपासना करणी। प्रतिक वीं ने के'वे जीं में नाम ही ने साक्षात् उपास्य मानणो। याने नाम नामी में अभेद भावना करणी, यो विचार दृढ़ता शूं राखणो के और म्हारे कोई भी कर्तव्य नी है। सिवाय ईं रे। वा स्मरण करती वगत चो चित्त अठी रो उठी, जावे, तो यो विचारमओ के कुल तमाम नाम सिवाय प्रलोबन है, बाँधवा री पाशाँ है, नाम शूं हट्या के बन्धन विह्यो। अगर कोई सांसारिक कार्य व्हे' तो वीं रो चिन्तवन नी करणो, याद आवे ने कर्तव्य व्हे' तो नाम में सुरता राख, कर काड़णो वा एक पानां पे याद लिख लेणो, ने एक टेम राखणी वी वगत कर काड़णो।
प्रश्न- विना विचारियां कठिन कठिन वातां किस तरे' व्हे ? क्यूं के अर्थ शास्त्र में केवे के-
"बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताय"
उत्तर-विचार शूं व्हे' सो ठीक, पण बुद्धि री, विचार साथे भी आवश्यकता विना बुद्धि रो विचार ऊँधो पड़े। ईं शूं नाम उपासी रे जश्यो थोड़ी देर में विचार व्हे' वश्यो दूज्यूं समय में भी नी व्हे'।

(18)
उदार हृदय व्हेणो। मतलब यो के जदी मनख शोक, भ्रम, लोभ आदि रे वश व्हेवे, जदी स्थूल हृदय भी संकुचित व्हे', क्यूं के चैतन्य हृदय रे ईंरो पक्को सम्वन्ध व्हेट ज्यूं है। ईश्वर चैतन्य हृदय भी उदार रे'वे तो यो भी, रे'वे याने खुल्यो रे'वे। ईं शूं उदार हृदय री प्रशंसा है, के वी करणी दुःख ने प्राप्त नी व्हे'।
(19)
वासना वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम्‌।
सर्वबूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोस्तुते।।1।।
37-39 वो विचार ज, ईं रो अर्थ है। सम्पूर्ण वासनामय संसार जणी शूं है, ने वासना रुपव ही शूं जो सर्वव्यापक ने सब शूं प्रथक् है।
रवि आतम भिन्न न भिन्न जया।
-मानसे,
जो ईश्वर है वीं रा वासुदेव, शंकर्षण प्रद्युम्न, अनिरुद्ध जीव, ईश्वर अहङ्कारादि भक्ति मत शूं भदे है "सब एक ही।"
(20)
नाम प्राणायाम भस्त्रिका !
प्राणायाम किस तरे' करमओ नेसह में प्राणरी जय किस तरे व्हे' ? इत्यादि जिज्ञासा करवा री कोई आवश्यकता नी है। केवल नाम स्मरण सूं प्राण वश में व्हे' जायगा। भस्त्रा प्राणायाम री विधि शूं नाम स्मरण व्हेवा शूं भी जल्दी ही प्राणामयाम व्हे' शके है। ईं री विधि या है। के श्वास लेती वगत वणी श्वास पे जतरा व्हे' शके नाम लेणा, निकलतां भी यूं ही। ईं में उच्चारण व्हे' ज्यूं जणावे। ईं शूं चित्त चञ्चलता भी करे, तो पण कुछ भय नी, स्वयं चञ्चलता मिट जायगा, ने एकाग्रता ने अनेक उत्तम अनुभव व्हे'गा। सिर्फ संकल्प मिटावा रो विचार राखणो, फेर सब मिट जायगा। सिर्फ गरमी, जणावेगा, कफक्षय व्हे'गा, उत्तम साधन है।

(21)
भूगत भोग व्हे' रियो है।
ज्यूं कणी नखे ही पट्टा वा पक्की सबूत व्हे' के या वस्तु ईंरी है। ज्यूं शास्त्र, सन्त केवे के जीवादि में पृथक् सत्ता कुछ नी है। ईश्वर ही री है, पर घणां दिनां शूं ईं पे अज्ञान रो भुगत भोग व्हे' गयो, ने झूठा गवाह भी मूर्ख थोड़ा लालच में आय के' वा लाग गिया, ने नवा परवाना नास्तिक दर्शन भी वणाय लीधा। इं वास्ते यो न्याय फोजदारी रे बिना तै' नी व्हे' गा। ईं वास्ते प्रबोध चन्द्रोदय अनुसार देवी सम्पद (देवी फौज) शूं आसुरी (फौज) ने मारमी चावे।
(22)
अनुभव...
डेसणोक श्री वन्दावन, चित्तौड़ बीजणवास रा विचार अवश्य याद राखणा चावे।
(23)
तृष्णा..
ईश्वर में मन क्यूँ नी लागे ? जदी तुच्छ विषय में कुछ भी सुख नी है, प्रत्यक्ष में नाश व्हे'ता देखरियाँ हां, फेर याँ शूँ वैराग्य क्यूँ नी व्हे' ? श्री व्यासादि महात्मा रा उत्तम उत्तम उपदेशाँ रो नित्य पाठ कराँ फेर क्‌ऊँयाँ रो असर नी पड़े ईं रो, वा परमारथ शूँ मनुष्य विमुख क्यूँ व्हे' है ? ईं रो उत्तर अतोरई है के-"कामना, चाह, वासना।
"चाह कोटी की अरु कोडी की दोनों देख बराबर है।
राऊं रंक तृष्णा के मारे व्याकुल दीन सरासर है।।"
--श्री बलवन्तराव,
किंचित् श्री वासना ही' के ज्ञान नाश व्हे' जायगा। क्यूँके इच्छा-वासना शूँ ही बन्धन है। ईं वास्ते यूँ विचारणों के यूँ म्हारे प्रबन्ध कर भजन करूंगा, पूरी मूर्खता है, के पे'ली ही भजन रो शत्रु वासना ने उत्पन्न कर दीधी। हाँ, दूसीर वासना शूँ या ठीक है, पण भजन में या ही भारी विघ्नकारी है। ईं शूँ भजन रो समय भी मनख चूक जाय। ज्यादा कई, सौ-साठ वर्ष ईं में ही वीत जाय है, ईं वास्ते श्री गीताजी में आज्ञा है के-

"अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य मजस्व मामूँ।"
-श्री गीताजी
समयो हेरत भजन करन को, समय कबहु न पावेगो।
दिन समयो जगदुंद में वीतत, निशि मन जाग भ्रमावेगो।।
कृष्ण कुंवर सुमिरन को आछो, समय कबहु न आवेगो।
नागरिदास समय हेरत ही, अन्त समय व्हे' जावेगो।।1।।
--श्री नागरिदासजी,
जो उत्तम निदुःख समय चावो, सो वासना त्याग शूँ व्हे'गा, दुर्ज्यूं नी व्हियो, नी व्हे'गा। आपाँ संसारी काम रो अतरो आलश नी करां, कणी कणी दिन रोटी भी नी खावाँ, कदी कदी राते नींद भी नी काढां, कदी आखोदिन धूप, शीत, वर्षा, शरीर पे सहन करां, पण ईश्वर स्मरण ईं तरे' चित्तलगाय कदी नी कीधो। अहा ईं रा संकल्प राते भी सपना में प्रत्यक्ष दीखे। ने जां काम बगड़ग्यो, वीं री चिन्ता छाती ने दग्ध कर्यां करे। पण भारी काम ईश्वर रो स्मरण नी व्हियो। ईं विचार शूँ कदी किञ्चित् भी घृणा नी व्ही'। जदी महाकष्ट उठाय लौकिक सुधारवा वास्ते याने लोग कई के'गा, यूँ विचार, बीमार पड़़ गया, पण लो रंजन (राजी) कराव री कोशीश कीधी। पण यूं नी विचार्यो के झूठा लोगाँ रो उतरो विचार, पण व्यास आदि महात्मा जदी आपां मनुष्य जन्म हार गियाँ हाँ, कई के' वेगा।
जदी लोक वासना, शास्त्र वासना, देह वासना, कणी शूँ पूरी नी व्ही' तो तो आपां तुच्छां शूँ पूरी किस तरे' व्हे'गा श्री करुणानिधान मर्यादा पुरुषोत्तम रघुकुल तिलक आदि शक्ति, जगन्माता रो त्याग कीधो, राजा रो त्याग कीधो, तो भी ईं ने पूरी नी कीधी, सुरगुरु (वृहस्पति) भी विद्या नी जाणकता सा कच (बृहस्पत्ति जी रो पुत्र) शुक्र जी शूँ शीखवा गयो-
शक्रादयोऽपि यस्यान्तं न ययुः शब्दावारिधेः।
इन्द्र भो पार नीपाया जणो शब्द समुद्र रो"
--सारस्वत,

फेर ईं ने कुण पूर्ण कर पावेगा। देवता अमर वाजने भी जदी पढ़े, तो मर्त्य (मनुष्य) ने ई अभिलाषा रो त्याग करवा में कई ऊजर है। चन्द्रमा रे क्षय है, दो वैद्य स्वर्ग में विद्यमान है। और जदी शोख रे वास्ते भी अनेक दुःख ने सुख रुप मानाँ हाँ ने यन्त्रणा सहाँ हाँ। फेर भी शोख ही बाकी रे' ने कुछ तुच्छ सुख वीं में मान्यों थको है। तो फेर परमानन्द सुख अखण्ड नित्य है। सच्चिदानन्द रा भजन रो शोख क्यूँ नी कराँ।
"नर संसारी लगन में, सुख दुःख सहे करीर।
नारायण हरि नेह में, जो होवे सो थोर।।"
--श्री नारायणदासजी
चाह बिना ही जो करे, कहे नरन के काज।
दियो ताहि सांचेन को, सुमिरण श्री वृजराज।।
--स्व रचित
सब रो मतलब वासना त्याग शूँ है।
विचार मात्र है-
घणा खा मनख कोई काम करमओ विचारे, कोई दूजचो पूछे यो काम आप करोगा ? जदी वी के'वे हाल तो विचार मात्र है। पण जदी कर काढ़े, वीं काम रे वास्ते के'वे यो तो म्हें कर काड्यो। पण कर कई काड्यो विचार काड्यो, यो भी विचार मात्र है। केवल विचार मात्र रो ही विचार मात्र में फरक दीखे। दूज्यूं विभाग करवा री चीज न्यारी, अन्य व्हे'णी चावे. पण आश्चर्य है, विचार मात्र नी करवा शूं विचार मात्र में बंधरियाँ हां।

(25)
म्हाँ शूँ तो कई नी व्हे'।
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तं मन्येत तत्वचित्‌।
--श्री गीताजी
महात्मा शूं कई नी व्हे' वी करता दीखे पण कई नी करे। क्यूंके "अहं" जदी कई नी है, और विचार भी कई नी है, वृत्यां कई नी है, जदी किसतरे' कई है। जदी याँ विचाराँ (दृढ़वृत्यां) शूं व्हे', तो भी ज्या चीज कई नी है, वींरो भेद दृढ़ अदृढ़ भी कई नी व्हिया। वात की वात करामात को करामात रो भी यो ही मतलब है। सब सूँ बड़ी करामात या ही है के म्हूं नी, जदी म्हाँ सूं कई व्हे'।
(26)
स्वप्न में अशी बरोबर ओशान रे'वे के यो स्वप्न है। तो भी हर्ष शोक व्हे'। पण जदी जाग्रत री याद आवे, जदी स्वप्न री याद भूल जाय। ईश्वर री याद शूं संसार भूलणी आवे, संसार भूलवा शूं ईश्वर याद आवे, केवल ज्ञान शूं कई नी व्हे'। दृढ़ता चावे, ज्ञान में श्रवण मनन निदिध्यासन चावे, भक्ति में प्रेम चावे।
(27)
भाटो वधे, तो के हाँ वधे।
बुद्धि, निश्चय दृढ़ करवा रो नाम है। मन के'वे यूँ व्हियो, बुद्धि केवे ठीक यूँ ही व्हियो। बारवास में मनख व्हे', कोई के'वे, वो तो मर गियो, बुद्धि वीं ने ही मान ले। आँखाँ फूटे कोई केट ऊँट आयो, बस या ही सही। यूँ ही बुद्धि शूं संसार रो निश्चय है। बुद्धि याने दृढ़ चित्त री वृत्तिः।

(28)
सहस्त्रार्जुनीय न्याय।
वासना मेटां के अहङ्कार?
सहस्रार्जुन रा हाथ कटवा शूं भी सहस्त्रार्जुन पमो नाश व्हे' गयो ने शरीर शूं भी। मतलब बिना शरीर केवल हाथ सहस्त्रार्जु नी है, बिन ाहाथ केवल शरीर सहस्त्रार्जुन नी है। चाहे जो ही पूर्ण मटिवा शूं जीव पमो मिट जायगा। वासना अेक है, अहं एक है। सो एक ने जीतवा में सुगमता व्हे'गा, फेर ज्यूं सुगम पड़े। एक पराक्रमी दीखे तो क्रम क्रम शूं छोटी वासना काट पठे म्होटी काटणी, पण शीघ्रता ईं में उचित है।
(29)
हाल तो नाचेगा।
वासनादि बिलकुल परमारथ री आड़ी नी जाय तो यूं जाणणो, नाचणी हाल नाचेगा। क्यूं के थाकी नी है। नाचवाने जगा' चावे वीं शूं बेठवा ने तो थोड़ी' ज चावे पण हाल ईंरो नाचवा रो विचार है, पणजणी पृथ्वी नपे नाच री' है वणी जगा' बेठवा शूं आराम मिलेगा। वा शोकीन नचाय रिया है,सोय या भी थाक ने भी लोभ शूँ नाचे है। जतरे लोभ है जतरे नाचणो ही पड़ेगा। अशी वृत्ति वाला ने उपदेश नी करणो। महात्मा कर शके है।
(30)
सब प्रत्यक्ष है।
माया, ब्रह्म, ईश्वर-श्रीरामचन्द्रजी, सीताजी माया ई प्रत्यक्ष यूं है, के सीताराम यूं अन्तःकरण में स्मरण करमओ, सो नाम तो सीताजी जठा शूं उच्चारण व्हे' सो श्रीरामचन्द्रजी, ईं सिवाय जी स्फुरणा व्हे' सो माया, ब्रह्म झठे, याने जींरा आश्रय शूँन ाम स्फुरण व्हे' ईश्वर नाम, माया अन्य वृत्ति, दोयाँ ने भूलणो।

(31)
दुःख कई है ?
"अन्तर्बहिः पुरुष काल रुपः"
--श्रीमद्भागवते
वृत्ति रो अन्तमुर्ख व्हे'णो ही पुरुष, बहिमुर्ख ही काल है। श्री शङ्करावतार दुःख विपत्तिरो लक्षण हुकम करे है-
"कह हनुमान विपति प्रभु सोई।
जब तव सुमिरण भजन न होई।।"
--श्रीमानस
ईश्वर री'ज सत्ता शूं ज्या सत्य दीखे ने समर्थ व्ही', फेर ईश्वर ही शूं विमुख व्हे' आप स्वतन्त्र व्हे' जाय, तो वींने नाना प्रकार रा कष्ट व्हे'णा ही चावे, पर पाछी जदी आपणा स्वामी रे शरणागत व्हे' तो करुणानिधान ईं रा सब अपराध क्षमा करे।
"कोटि विप्र वध लामहिं जाहू।
आये शरम तजों नहिं ताहू।।"
--श्रीमानस
(32)
मदरसा में तो बैठे है ?
बालक जतरे नी भमे वींने विद्या रा नाम शूं भी अबखाई आवे, पण अश्यो नियम व्हे' जाय, के अतरी देर मदरसे जाणी, ने बेठा रे'णो तो भी वो चावे के मदरसा में नी और जगा भले ही खेलूं भी नी पण अठे बेछणों तो नी शूं वावे। यूं ही नाम ठाम सत्संगत रो हाल है। पण जदी बेठवा लागे, ने गुरु घर रो डर व्हे' खबर पड़े, तो पछे तनखा दे, सेवा कर भणावा वाला ने हेरतो फिरे।
(33)
पराक्रम तो ईंरो ही नाम है।
माया शूं बन्ध्यो थको, मन दुस्सह यन्त्रणा पावतो थको, अनेक प्रलोभन देखतो थको भी छूट परमेशर रा चरणआंने गाड़ा पकड़ ले। बस, पछे कई चावे सब भाग जावे।

(34)
बच्चा ने बांधोगा जदी दूध मिलेगा।
गायरा बोबा में शूं दूध काढ़ती वगत बच्चो हाथ छोड़ाय दे', रपटाय दे' ढोलाय दे' पण बच्चा ने बांध पछे गाय ने दू'वे जदी दूध ठीक तरे' हाथे लागे। यूं हीं मनने रोक भजन करे जदी आनन्द आवे दूज्यूं मन वच्चे-वच्चे हटतोजाय। दूयो थकीभी ढुल जाय। वा विद्ाया रुपी बच्चा ने छोड़ गाय रुपी प्रकृति सात्विकी ने पवसाय ले'णी। फेर विदाय ने भी बांध परम पुरुष रुपी दूध दूय ले'णी। पछे वींरा बोबा में दूोध नी व्हे', वा, पे'ली, नी व्हियो, गाय तो दूध देती ही रे'गा। आपणो मतलब व्हे' जाणो चावे।
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः।
पार्थो वत्सः सुधी र्भोक्ता दुग्धं गीतामृंत महत्‌।।
गायां उपनिषद् सारी, दूहे गोपाल कृष्णजी।
गीता दूध पिये ज्ञानी, बम्यो अर्जुन बाछरु।
--गीता महात्म्य
(35)
ज्ञान करां के भक्ति ?
ईंरो वर्णन पे'ली आय गियो। भक्ति रा विघ्न ज्ञान में ने ज्ञान रा भक्ति में देखाया, सो दोयां रा दोष छोड़ बाकी रे' ज्यो करणो. ज्यूँ भक्ति वाला मनख जागरणादि ईश्वर सम्बन्धी नाम ले, अनर्थ करे, ज्ञान वाला जीव ने ब्रह्म के, अधर्म करै। पण अबार रा पे'ली नवधा भक्ति ने सात ज्ञान री भूमिका, आत्मसमर्पण, ने तुरीया (चौथी अवस्था) एक ही है। निर्विकल्प वा विदेह मुक्ति, ने पराभक्ति एक ही रो ज्ञान रो केवल के'वा शूं काम नी चाले शून्यता आवे।
कवि हिं अगम जिमि ब्रह्म सुक, अह मम मलिन जनेषु।
जैसे विन विराग सन्यासी।
काम क्रोध लोभादि रत ग्रहासक्त दुख रुप।
ते किमि जानह्रि रघुपतिहिं मूढ़ परे तम कूप।।
--श्री मानस
अवस्था एक है, झूठा जंजाल छोड़वा रा उपाय है। वां में पाछो मायाो रो लेश नी आवणो चावे। दूज्यूं ई साधन भी मिश्रित मायिक व्हे' जायेगा।
"कांचे मन नाचे वृथा, सांचे राचे राम।"
--
"अपने अपने मत लगे वादि मचावत शोर।
ज्यों त्यों सब को सेयबो एके नन्दकिशोर।"
--बिहारी सतसई

(36)
संग आसक्ति नी चावे।
संग: सर्वात्माना त्याज्यो सब त्युक्तुं न शक्यते।
सज्जनैः सह कर्तव्यो सतां संगो हि भेषजम्‌।।
सगति करण ीहीज नी चावे। अगर कर्यां बिना नी रे' वाय तो सज्जनां रे साथ करणी। क्यूं के सज्जनां री सगति ओखद है।
भेषण शूँ भेषज छूट जाय, यूं ही जदी सत्संग ने भी भेषज कियो, जदी ओर री तो बिलकुल नी चावे।
(37)
बुद्धि कई है ?
घड़ी-घड़ी रा विचार शूं जो विचारआप शूं आय पेदा व्हेवा लाग जाय सो बुद्धि है।
(39)
संसार ने सत्य नी जाणणो।
स्वप्न में, संसार में कुछ फर्क नी है। केवल विचार रे' जतरे ईश्वर याद रेवे, संसार नी रेवे। संसार याद रे' जतरे ईश्वर नी रेवे सो यां री भावना राखणी संसार कुछ नी है, ईश्वर ही है। प्रकृति अव्यक्त शूं बुद्धि अहङ्कार व्हिया, अहं शूं पञ्चतन्मात्रादि। बस कारण जीं रो अव्यक्त है, सो व्यक्त किस तरे' व्हे शके है।
(39)
वासना
अणी रो मतलब ोय है। ईं शूं जीव रो ईश्वर में वासना (ठे'राव) नी व्हे'। ईश्वर में स्थित समाधिस्थ भी ईं शूं पाछा संसार में उलझे। या नी व्हे' तो सब जीव समाधि में प्राप्ति व्हे' तो सब जीव समाधि में प्राप्ति व्हे' जाय-एक रूप व्हे' जाय। और समाधि प्राप्ति रा बहिरंग साधन या अन्तरंग 'ना' (जो पुरुष) ईं रो वास व्हे' करवा शूं। संसार में 'ना' निषेध रो भी वाचक है, सो नी करवा शूँ ईश्वर में विकल्प वाचक 'ना' है सो मनुष्य विकल्प शूं एक पक्ष में वो है वा नी है, ईं शूं ही व्हेवा शूं वो नी है, नी व्हेवा शूं वो है।
ज्यूं पुष्प एक है वा अंतरआदि सवास दृव्य एक है, ने वीं री वासना छेटी छेटी नराई व्यक्तयां ने प्राप्त व्हे' है। यूं ही वासुदेव एक ही है। वीं री ही वासना सम्पूर्ण जीव है।
"वासुदेव, सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ।"

--श्रीगीताजी
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जठी सूं वासना आय री है, वठी जावा सूं वो सुगन्धि दृव्य अवश्य प्राप्त व्हे'गा।
प्रश्न-एक वासना शूं भी जदी जीवत्व है, फेर ईश्वर में सम्पूर्ण वासना व्हेवा शूं वो भी बंध व्हे'गा?
उत्तर-आग ने आग नी बाले, ईश्वर वासना रो कारण है। जीव वासना रो कार्य है। प्रकृति जो है, सो जड़ है। वीं ने प्रेरमआ ईश्वर शूं स्वतः व्हे', चुम्बक लोहवत्‌।
"मयाध्यक्षण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्‌।
न च मां तानि कर्माणि निबन्धनाति घनञ्जय।।"
--श्रीगीताजी
जणी तरे' शूं पाल पे जाय पछे तलाव में स्नान करणओ, याने पृथ्वी तत्व छोड़ जल तत्व में प्रवेश करमओ। यूं ही वासना त्याग शूं वा वासना रा मूल आदि प्रकृति ने प्राप्त व्हे' ईश्वर में प्राप्त व्हे'णो। वासना प्रकृति में है पण वा नी व्हे' ज्यूं है, जदी ईश्वरी सत्ता शूं चेष्टा करे तो मनख प्रकृत्ति रा अन्त ने वासना रा अनत् ने पाय जाणे, ई में तो कुछ नी है। वास्तविक ईं में सत्ता ईं री ईस्वर री है, जदी वो आपणा असली स्वरुप ने प्राप्त व्हे' जाय सांख्य शूं या वात देखणीचावे। फेर जो आदमी ज्ञानी व्हे' जाय या जाण जाय, वासना मय ही संसार है, वासना कुछ भी वस्तु नी है, तो वींने भी बन्ध नी व्हे'। फेर वो चावे सो करे तो ईश्वर ने वासना किस तरे बांधे-
"की तोहि बांधन छोरन हारा।
तुम बांधत छोरत संसारा।।"
--व्रज विलास

(40)
बालक ही राजा है।
बालक केले वीं में बालक ही ने दूजा बालक राजा मान ले। फेर वींरा हुकम माफिक काम करे' यूँ ही चित्तवृत्ति ही अहं जीव व्हे' गई। वा ही बुद्धि मन आदि व्ही' ने वीं ज वीं ने मानी। जदी म्होटो आदमी ज्ञान देखे, तो वीं रे भावे तो तमाशो ही है, असली ईश्वर राजा ने तो वो ही जाणे है।
(41)
स्वप्न भी आवे है, स्वप्न में की ने ही दीखे, म्हने स्वप्न दीखे रियो है। अबे म्हूँ जागूँ, फेर वीं ने अनुमान व्हियो, अबे म्हूँ जाग गयो। एक साधु काशीजी में देख्या, ज्याँ ने वर्ष पेली बिमार देख्या, फेर नक्की व्ही', यो तो स्वप्न नी है, फेर जाग गयो, एक प्रेतणी आई पर मन री वृत्याँ रोकवा शूँ वीं रो नाश व्हे'गयी। यूँजदी वृत्ति फिरे तो फेर प्रेत आदि दीखे. एकाग्र व्हेवा शूँ सब नाश व्हे' जाय, फेर जाग गयो, बस वीं ने नक्की व्ही'यो भी यूँ ही व्हे'गा।
(42)
"म्हूँ" तो केवल बन्धन ही है।
पञ्च ज्ञान-इन्द्रियाँ पाँचविष्याँ री ग्रहण करे, कर्मेन्द्रियाँ कर्म करे, मन याँने सत्ता दे'। बुद्धि निस्चय करे. ईं में कई करे ? गेले चालताँ बन्धन करे। जो व्हे' सो बिना म्हूँ रे व्हे' है। फेर शून्य रुप आप शूं कई प्रयोजन सिवाय बंधवा रे।
जीं रो कार्य नी देखे वीं रा कारण रो निश्चय कर लेणो, बुद्धि री भूल है। अहंकार रो कोई कार्य नी है और नी स्वयं प्रत्यक्ष है, फेर ईं ने मानणो केवल दुराग्रह, हठ अभ्यास अज्ञान है, और रो काम वच्चे ही ापणी करे, तो जन्म मरण व्हे'।

(43)
सब "म्हूँ" है, ने "म्हारो" है।
दो आदमी एक गाय जाय रिया है। एक ने पूछयो कठे जाय है। जादी वणी कियो म्हूँ गाम जाऊँ हूँ, फेर दूजे कियो म्हूँ भी गाम जाऊँ हूं। वणी पूछ्यो कुण पूछावे है, वीं कियो म्हूँ पूछुँ हू। एक कियो म्हूँ पाणी पियूँ, एक कियो म्हूँ ठंड्यां मरूं। 'म्हूँ' 'म्हूं' में तो कई फरकनी पड्‌यो फेर भेद क्यूं ? एक केवे 'म्हारो' मन राजी है एक केवे 'म्हारो' मन बेराजी है, एक केवे 'म्हारे' हाथी है, एक केवे 'म्हारे' घोड़ो है, एक केवे 'म्हारे' कई नी है। कोई के' 'म्हारे' सब कुछ है। सब 'म्हारे' ही 'म्हारी' व्हियो फेर एक हीज वात 'म्हारे' क्यूं है सब 'म्हारे' है।
(44)
अहं आँकड़ो है।
ज्यूं गाडी शूं अञ्जन अलग है, पण वच्चे एक आंकड़ो व्हे' जीं शूं दोई जुड़जाय। यूं ही जड़ शरीर ने चेतन ब्रह्म विलक्षण व्हेवा पे भी अहं जोड़ दीधा है।
(45)
"अहं" पिचकारी रो मोगरो है।
ज्यूं पिचकारी में मोगरो व्हे' वीं शूं पिचकारी में जल भराय, पण वीं ने दबावा शूं सामला मनख पे वो रंग पड़ पिचकारी खाली व्हे' जा.य या 'अह' द्वारा संस्कार भेला व्हे' त्याग शूं खाली। वा छापा री कल नीचे आवे जी पाना पे अक्षर छप जाय, यूं अहं' युक्त चैतन्य पे संस्कार जम जाय। गोली वणावा री कल शूं गोल्यां वणती जाय, ज्यूं, 'अहं' युक्त कार्य शूं शरीर वणता जाय, याने कर्माशय वणे। संस्कार रूप शूं कार्य व्हे' जाय, दूज्यूं है, जश्या कार्य रेवे, याने वाँ रो रुपान्तर नी व्हे'।
(46)
"भूत" तो नी है, पण भय है।
कोई मनख भूत ने नी मानतो हो, एक दाण वींने एकलो ऊपर रा मकान मं कणी जावा रे वास्ते कियो। जदी वण ीकियो भूत तो नी है, पण भय है। यूं ही संसार तो नी है, पण ईं री सत्या जम री है। नी व्हे जीं रो भय भी नी चावे, यूं ही जाणणो।
(47)
वृत्यां काला मूंडारी सलाई (सेपटी माचिस) है।
काला मूंडारी सलाई ने रेजीज पेटी पे रगड़वा शूं सुलगे। यूं ही वृत्ती ने जठे उत्थान व्हे वठे ही स्तित करवा शूं प्रकाश व्हे है, विधि युक्त।
(48)
भंगी री गेणे मेली हवेली।
भंगी हवेली ने गेणे मेले, ने बलाई गाँम ने, ोस वांरो मेल्यो गेणो थोड़ोई रेवे। केवल वाँरी लागत, उचिष्ट वगेरा ही गेणे मेल शके। यूंही 'अह' ब्रह्म ने आवरण थोड़ो ही कर शके, केवल वृत्यां पे ही अधिकार करे।

(49)
एक पे नराँ रो अधिकार है।
जमीन ने कमावा वालो हाली के' म्हारी, करशो पे म्हारी, बोम्यो ठाकर के म्हारी, वीं रो ठाकर के म्हारी रईश के' म्हारी, अंग्रेज के' म्हारी, काल के' म्हारी, वश पछे कोई नी के' म्हारी। वा जमीन (शरीर) भोम्या वगेरा सम्बन्धी (जीव वृकादि)।
"देहं किमुत दातैः" इत्यादि
-श्री भागवते
(50)
वारणे जायगा, तो बागड़ बूंची कान काट लेगा।
हे वृत्ति थूं बहिमूर्ख व्हे'गा तो अविद्या कान "श्रुति" काट लेगा। जो थे वेदानुसार निर्णय कीधो वो छेटी कर देगा।
(51)
गोटा बालक लड़ावे।
बालक डोरो पकड़़ हाथ हिलावे जदी गोटका लड़े। आप केवे मींडा लड़े ने राजी व्हे'। यूं मन आपही संकल्प करे, आप ही सुख माने। लकड़ी ने घोड़ा री भावना कर, टचकार, लकड़ी री दे'। वृत्ति में ही वृत्ति री भावना कर वृत्ति ही दुःख पावे।
(52)
गोपालदास आवेगे तो हम नही आवेंगे।
एक भंगी साधु व्हे गयो, सो एक साधु वीं ने ओलखे सो एक जगा' सब साधुवां ने जींमवा बुलाया। जदी वणी कियो गोपालदास आवेगे तो हम नहीं आवेंगे। क्यूं के वो म्हने ओलख लेगा। यूं अहँकार कियो के ज्ञान आवेगा, तो म्हूं नी आऊंगा। ओरां में तो अंह रे' गयो गोपालदास रे शामिल नो रियो, ने जबर्दस्ती जीमावा वाली राखेगा, तो छोटा गोपालदास, ज्ञान, चल्यो जायगा। गोपालदासजी रा चेला ने भी वाँ रा गुरु वाकब कर दीधा। अर्द्ध प्रबुद्ध के' अश्यो साधु देखे, तो पाछा उरा आवज्यो। क्यूं के वाँ में वीं ने निकालवा री सामर्थ्य नी है, ने वी के' देवे, वो तो वठे ही है, तो आप गोपालदासजी भी नी जावे, ने जो खु आय गया, तो यो पड़ता हाथाँ भागे। चेलारी वात थोड़ा साधु माने।

(53)
दो आँटा हाथा शूं ही लीधा।
अहंकार ने, इन्द्रियां बुद्धि री मन री पटेलता कणी भलाई, पाग कणी बंधाई, दो आँठा हाथ शूं ही लीधा। राज में शूं तो मंजरी ही नी व्ही'।
(54)
सिवाय विचार और करांई कई ?
आपाँ सिवाय विचार और कराँ ही कई ज है। केवल विचार कराँ हाँ, हाथ हाले है, ईंमें कई प्रमाण, हाथ रो हालणो कई व्हियो ? केवल विचार कीधो हाथ हाले यूं ही यो म्हारे, यो थारे, इत्यादि सम्पूर्ण विचार है, गिया, आया, खाय, पिया, सम्पूर्ण विचार है, गेबा का घडोा दोड़़े हैओ। अन्ध परम्परा न्याय शूं नक्की कर लीधी, चैतन्य आकाश में उपन्यास रा पाना है, संसार नी है, वेंडा रा अनुमान है, अशक्त रा मनोरथ है। शशक रा श्रृङ्ग (खरगोश रा शींग) है, आकाश रो अंग है। दीखे सो प्रमाण, नेत्र, नेत्र रो, मन, मन रो, बुद्धि, बुद्धि रो, ईश्वर प्रमाण है। बस, वो ही है-
"यो बुद्धे परतस्तु सः"
--श्री गीताजी
(55)
दो दिन में दोलबाई रो कश्यो मूंडो व्हे' गयो।
एक काच में शल हा। वीं काच में देख दोली बाई कह्यो "दो दिलन रा ताव शूं म्हारो चे'रो कश्यो व्हे' गयो।" यूं मायो रुपी काच में ब्रह्म रो प्रतिबिम्ब पड़वा शूं विपरीत निश्चय व्हे' रियो है। वास्तव में काच में फरक है, मूंडा में नी।
(56)
कुण के'वे ?
जो जो आंपां रा विचार है, वी वश्या ही है? याने यो यूं व्हियो या कुण के'वे, गवाह विना गवाही मान लेणी। के'वा वाला ने विना देख्यां आश्चर्य री वात किस तरे मानणी।
(57)
"चार वर्ण चमार"
--श्री तुलसीदासजी
परमेशर री भक्ति विना शररी पे ममता रे'वे सो चमार री वृत्ति चर्म पे ही रे'। अष्टावक्र ऋषि री कथा शुणवा योग्य है, भारतान्तर्गत।
(58)
माता शूं विषय नी करणो।
ईश्वर री माया सम्पूर्ण है, जो दीखे सब है, सो ही ईश्वर री स्त्री व्ही'। जीव अहं माया जन्य है। ईं शूं ईं (जीव) ने ईं शूं (माया शूं) विषय नी करणो चावे, सार अहङ्कार युक्त काम नी करणो।
विजयसिंहजी रामजी हुकम कीधो।

(59)
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता।।
--श्री गीताजी
सब ईश्वर शूं प्रवर्त व्हेवे वा अहङ्कार शूं।
(60)
"यज्ञानां जयपज्ञोस्मि"
-श्री गीताजी
प्रारम्भ में कर्मयोग कीधो जाय, सो भी यज्ञ मुख्य है। वींमें भी जप यज्ञ विशेष है। उपासना में भी नाम स्मरण ही मुख्य व्हियो। क्यूंके नाम शूं ही ईश्वर प्रसन्न व्हे'। प्रेमादिक भी प्राप्त व्हे'। ज्ञान भी उपासना कर्म विनानी व्हे'। महावाक्य शूं भी ज्ञान नी व्हे'। वीं ने प्रणव रो जप उपनिषदाँ में लिख्यो, सो विध्न भी नाश व्हे' ब्रह्म भी प्रत्यक्ष व्हे'। यो ही मन्त्र योग, यो ही शरीर ने भस्रादि री विधि सूं हठ योग भी यो ही, ने लय योग भी यो ही, के मन री वासना लय व्हे' जाय। राज योग भी यो ही प्रतीक उपासना शूं यो ही प्रकट व्हे' बह्म रुप व्हे'।
(61)
झट मुक्ति ने झट भक्ति।
झट छूटवा रो उपाय यो ही है, के झट वासना छोड़ देणी, ने छोड़ दीधी अशी वृत्ति भी छोड़ ने शेष कई वृत्ति नी रे'। यूं समझणो, के जदी ईश्वर में मन लगायो जाय सो तो म्होटो मन व्हे' जाय। और वीं रे नीचे एक छोटो। सो मन यूं केट वे अवार नी, ज्यूं कोी नींद काढ़णो छोड़े जदी एक मन केवे थोड़ा शा शूय जावाँ बस, यो ही अनर्थ है। मन रा छल पारस भाग में लिख्या है, दृढ़ व्हे' मन रो नाश करणो। जो दृढ़ व्हे'गा वीं री विजय व्हे'गा। नाम खटको राखणो।
(62)
पुराणाँ रो अर्थ समझणो।
पुराण घणाँ गम्भीर विचार रा है। केलव ब्रह्म उपदेश ही याँ में भरप्यो है। लोग लौकिक दृष्टि शूँ ने हृदय री तुच्छता शूं अनेक कुतर्क करे। जो समझ गाय है, वी जाणेगा के पुराणकशी उत्तम वस्तु है।

(63)
तीर ने चमठी में शूँ छोड़ दी।
खेच में छाम्याँ रेवा शूँ तीर निशाणां पे नी लागेगा, छोड़़वा शूं लागेगा। यूं ही क्रम करवा शूं ईश्वर नी मिले, छोड़वा शूं मिलेगा। याने वृत्ति रो अभाव ही मुक्ति है। फेर कर्म करणो नष्ट व्हे' गयो। वीं रो क्रम दूजा ने दीखे वीं कणी रो ही नी दीखे।
(64)
ज्ञान-भक्ति-वैराग्य।
भक्ति युवा (जवान) ही, श्री बृदावन में ज्ञान, वैराग्य, वृद्ध दुःखी हा, सो भक्ति भी बड़ी दुःखी व्ही'। ईं शूं या जाणी जाय, के विना वैराग्य ज्ञान भक्ति दुःखी रे' है, ने ईं भक्ति रा पुत्र है, मतलब तीन ही एक है। भक्ति प्रेम व्हियो ने या नी जाणी, के ईश्वर है, तो ईं ज्ञान विना भक्ति में पूर्णता नीं व्ही'। दूज्यूँ सतीजी रे श्री वज्र गोपिकां रे दूज्यूँ "अन्यथा जाराणामिव" नारद सूत्र। फेर जदी भक्ति व्ही' ज्ञान व्हियो ने संसारी वासना क्रोधादि नी मिटया तो भी जाणणी पूर्णता नी व्ही'। क्यूँके-
"मोर दास कहा नर आशा।"
--श्री मानस
निष्कर्ष-ज्ञान, वैराग्, भक्ति ईं तीन ही समुच्य शूं एक ही है। याँ तीनाँ री एक ही वात व्ही'। व्यर्थवाद कर नी झगड़णो। एक ही मार्ग मुक्ति रो है, नाम तीन है, वास्तव में अश्यो ज्ञान व्हे' जी में ईं दोई व्हे'। अशी भक्ति व्हे' जींमें ईं दोई व्हे'। अश्यो वैराग्य व्हे' जी में ईं दोई व्हे'।
(65)
वणावोगा तो विगड़ जायगा।
हरे'क वात मकान आदि वणावोगा तो कदीक विगड़ जावेगा, सो कई भी नी वणावणो। बस पछे कई विगड़े।
(66)
अतरा दिन गिया ज्यूं ही अतरा दिन जायगा।
(67)
तीनां रे केवा शूं बकरा ने कुत्तो जाण्यो।
एक दिन एक ब्राह्मण गामड़ाम में शूं बकरा ने लाय रियो हो, रस्ता में तीन ठग वणी ने देख, ब्राह्मण ने कियो-"अरे, अरे, राम, राम, ब्राह्मण व्हे' ने कुत्ता ने ले' जावे।" बार बार केवा शूं विचारे ब्राह्मण, बकरा ने कुत्तो मान लीधो।
(68)
एक चित्त री वृत्ति निरन्‌ातर वीं में राख, पचे भले ही संसार में उचित कार्य कर।

(69)
इन्द्रियाँ रो पेट, मन, म्होटो अगाध है।
(70)
साँची, साधु केवे', के श्रृंगारी।
(71)
माकड़ी रा तार पे माकड़ी'ज चढ़ शके है। अनुभव री वा अनुबी समझ शके। चित्तरी एक वृत्ति रे' है, वा बड़ी शूक्ष्म व्हे' है। वीं ने यूं जाणणो के आपांरां मन में अबार कई है, तो भी वा नजर नी आवेगा। पण ठीक विचार सूं कुछ कुछ प्रगटेगा। वा यूं विचारां के अबे कई नी विचारां नाम लां जदी, वा मगर पाणी पे कणी कमी वगत तर आवेज्यूं दीखेगा। अबे वीं रो परिकर विचारणो, के या किस तरे' पैदा व्ही'। बस वीं मिटावणा। स्थूल वृत्तियां जी लाई थकी है, वी तो मिट जायगा, पण भाटा पे तेल री चीकटाईज्यूं वां री जड़़ रे' जाय। घणी मक्खी रा दाणा री नांईं भाटा शूं उठ जाय। वा सूक्ष्म वृत्ति ही स्वप्न में प्रकट व्हे'। घमा समय री भी वा सूक्ष्म वृत्ति ईश्वर में रेणी चावे, जो महाकष्ट में भी साथ नी छोड़े। ज्यूं श्री व्रज गोपिका री प्रेम शू ंया वृत्ति खूब ठे'रे, ने अभ्यास करतां करतां व्हे' भी जाय, बस, यो ही प्रबल उपाय ईश्वर प्राप्ति रो है। चाहे योग व्ही', चाहे भक्ति चाहे ज्ञान। ईं ज साधन री कबीरजी वा गोस्वामीजी महाराज आज्ञा कीधी है-
"कामिहिं नारी पियारी निमि, लोभी के प्रयि दाम।"
--श्रीमानस
"छल छन्द भरयो न तजे छलता।
दरसावत ऊपुर ते ममता।।
तिमि अन्त समै हरि ध्यान धरे।
जगह जाहिर बाहिर काज करे।।"
यो साधन व्हेवा शूं फेर वीं रे सर्वदा स्मरण ही है-
'जुग लोचन पै जस काच रहे
सित हूं तेहि दीस तरंग बहे।।'
यो ही कारण है के स्त्री वा प्रिय वस्तु देख्यां बाद अनेकवातां व्हे' तो भी स्वप्न, और वातां रो नी आवे। वीं ज संस्कार रो आवे, जो पे'ली जम्यो, सोजीं जगां वो संस्कार रे'वे बठे ईश्वर रो राखणो। चीकटाई रे पाणी रपटजाय। यूं हीं पे और रपट जाय, वा और कोई संस्कार अश्या व्हे' गया व्हे' वींरो तो नाश कर देणो। वीं जगा' नाम वा ध्यान आदि संस्कार बेठाय देणा. पल देणो, रुप बदल देणो। संस्कार बहुरुप्या है, झट वो पलट, भावना शूं दूजो व्हे' जायगा। प्रार्थनादि मन रोकवारा उपाय शूं भी।

(72)
पाणी ही जमीन खोद गेलो कर लीधो। सो जमीन खोद रोक देवा शूं ले' जठी जायगा, पाणी वे'वे, सो वींरे वें वा शूँ वीं रे गेलो व्हे' जाय, जदी वठी ने हीज वि'याँ करे। यूँ ही विशेष अभ्यास शूँ वृत्तियाँ में ज्यो ज्यो निश्चय व्हे' वठी ज वृत्याँ स्वतः जावे. क्यूंके वा ही निश्चय व्हे'गी।
पे'ली तो वींरो व्हेवा रो स्वाभवा है, सो व्हे' फेर गेलो व्हे'ताँ-व्हे'ताँ व्हे'गयो। जदी या इच्छा व्हे' अठी पाणी शूं यो नुकशाण व्हे'वे, तो वठो आपां जमीन खोद न्हाक देणी, फेर ओर आडी वे'वेगा। यूं अभीष्ट स्थान पे पोंछ जायगा। वा वर्षा (काम) बन्द व्हे'गो ने ज्ञान (सूर्य) उदय व्हे' गयो, है जोई पाणी सूख जायगा, फेर बाँध री जरुरत नी है।
(73)
अधिकारी भेद।
घमआ शास्त्र उपदेश (तरे तरे रा उपदेश) अधिकारी भेद शूं ही है, वास्तव में गम्य (साधवा योग्य) ेक ही है-
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव
-शिव महिम्न
पगत्या पगत्या चढ़वा में कोई झट झट चढ़ जाय, कोई पे'ली रा चढ़ चुक्यो सो आगेरा तै करे।
(74)
बालक खणवा शूं डरे, चेचक शूं नी।
मनख थोड़ा दुःख शूं डरे, मृत्यु शूं नी।।
(75)
ऊंदरा रोटी जाणे, पींजरो नी।
मनख तुच्छ सुख जाणे, बन्धन नी।।
(76)
या ही प्लेग, या ही महामारी है, जीं ने तृष्णा केवे वा वासना। ईं शूं अनेक जीव मरे जनमे है।
(77)
ईश्वर भजन अन्त समय रे वास्ते है, नेअंत समय में महा कष्ट व्हे' जददी अणी थोड़ा दुःख में ईश्वर ने भूलाँ तो जदी (वश्या मोत रा दुःख में) किस तरे याद आवेगा।
(78)
ईश्वर प्राप्ति व्हे' जदी अनेक सुख व्हे'।
जदी ईं थोड़ा सुख में ईश्वर ने भूलाँ, जदी वठे किस तरे याद रे'गा।
(79)
जीं माया ने प्राप्त करणो चावो वा तो भजन में छूटेगा। वासना त्याग सूं जदी मुक्ति है, तो वासना क्यूं राखणी। जे'र थूंकवा शूं वचाँ जदी वीं ने गले क्यूँ उतारणो, ने मूंडा में क्यूं राखणो।
(80)
पछे करमओ सो पे'ली करो। क्यूँके यो मन पछे पछे करतां पाछे न्हाक देगा।
(81)
नर री चींता वात हुए नह, हर री चींती बात हुए।
--प्राचीन
वासना समय शूँ पूरी व्हे' जदी पे'ली शूं वीं ने मन में वास नी करावणो-
'प्राप्त प्राप्तमुपासीत हृदयेन व्यरुपता।'
--भारते
(82)
पेट में तो पड्‌यो ही नी ने काका रो वण्यारो आयो।
कर्म आरम्भ कीधाँ पे'ली ही फल चावणो। प्रायःकर्म आज काले अस्या ही व्हे' के फल री इच्छा व्हे' पछी आरम्भ व्हे'। उचित या है, के क्रम पूर्ण व्हेवा पे भी फल नी चावमो। एक में बन्ध, एक में मोक्ष पाय जीव इच्छा पूर्वक कर्म करे है।

(83)
आपणो विचार कदी पूरो व्हियो।
आपाँ विचारां, यूं व्हेवा पे भजन करांगा, यूं व्हेवा पे भजन करांगा, पण आपणी अतरी ऊमर व्ही' अणी यूं करणे कदी एक घड़ी भी छुट्टी नी दीधी। कदी भी अशी एक घड़ी की निकली के जीं में कृतकृत्य या ने "अबे कई नी करणो" अश्यो व्हियो व्हे'। ईं शूं यो मृत्यु समय भी छुट्टी नी देगा। लिख्यो है-
कामानुसारी पुरुषः कामाननु विनष्यति।
-श्री महाभारत।
(84)
मन ने बोलाव शूं मौन करावणो। क्यूंके यो बोले जदी जीब हाले, मौन शूं संसार छूटे।
(85)
ब्रह्म में चैतन्य व्हियो, वीं में मन सो ब्रह्म चैतन्य एक ही। मन असत् सब मन कृत।
(86)
विचार पूर्वक कार्य करणो। हरे'क कामरे पे'ली म्हूं करुंवा कर्यो, आवे जदी यूं विचारमो म्हूं तो कई नी इन्द्रियादी करय्‌ां करे। या भी विचार में विचार, चैतन्य में चैतन्य ब्रह्म है, यूंं वृत्ति फेरणी।
(87)
विषय में प्रवृत्ति सुखानुस्मरण पूर्वक (वींरा सुखां ने याद करवा शूं) व्हे' सो सुख निकाल अगर विषय करे तो कदाचित् कींरी भी प्रवृत्ति नीं व्हे' प्रत्युत ग्लानि व्हे' ने सुख आत्मा में है, सो विचारणो चावे।
(88)
स्वप्न में स्त्री सम्भोग में जो निश्चय व्हे' वीं अनुभव ने याद राख जागृत री तुलना करणी के कतरो फरक पड़े। केवल बुद्धि में या आवे स्वप्न मिथ्या है। यूं ही निश्चय में या आई के संसार मिथ्या है, के मिथ्या व्हियो।
(89)
यो विचार राखणो के एक चिकादाश है। वीं रे आश्रय चित्ताकाश है। वीं रे आश्रय भूताकाश है। ईं शूं जो जो विचार आपां ने फुरे वृत्तियां उठे वी चिदाकाश में उठे है, ने वी वृत्तिया चिदाकाश रूप है सो वांने नीची नी आवा देणी, किन्तु चिदाकाश में स्थिर करणी। मतलब देह में वृत्तियां उठे यूं नी विचारणो, किन्तु वृत्तिया में यो देह है सो वृत्ति रो देह पे नी आवणो ही मोक्ष है। ज्यूं रावण रा माथा। श्री करुणानिधान ऊंचा रा ऊंचा राख्या। यूं ही शरीर रूपी भूमि पे वृत्ति रूपी रावण रा शिर नी आवणा चावे, पण वठे रा वठे ही नास कर देणा यो ही मोक्ष है।

(90)
करणो छूटे जदी तरणो व्हे।
(91)
मरणो ज्यूं ही जीवणो। विचार में तो मरणओ जीवमओ कई कोय नी। विचार कईवस्तु है सो विचार शूं समझ में आवे, मतलब योविचार ज्यूं ही वो।
(92)
लोही मांस आदिक ही म्हूं है, तो घोड़ो-गधो म्हूं क्यूं नी ? दूजो मनख क्यूं नी ? अगर जाति ठआदि री मानी जाय तो कल्पित है। कृशतादि शूं मानी जाय यां में भी परिवर्तन व्हे' है, जदी म्हूं कुण हूं, कई नी।
(93)
कृतघ्न दगाबाज रो साथ मत करो, (शरीर)।
(94)
विष्टा, मूत, थूंक, लोही, मांस आदि मत अवेशे। शरीर प्राचीन कृतघ्न (ने ?) विनाशी (है ?)।
(95)
प्रश्नः- ईश्वर में आड़ो कई है ?
उत्तर-अहङ्कार।
(96)
उपदेश दूजां ने नी करणो पण, मन ने समझावणो। दूसरा ने के'वा में हानि, मनने के'वा में फायदो।
(97)
सब ईश्वर री माया है और म्हें भी माया में हां। अविद्या है बस, या अविद्या है, अतरी याद ही घणी।
(98)
या वात तो उठी जठा शूं ही झूठी।
संसार में या वृत्ति में व्हे' वृत्ति शूं या साबित व्हे' के यूं है, ने वृत्ति जो है ही नी।
भाग-3

(1)
कोठरी शूं एकान्त सूचित व्हे' के वठे दूसरो कोई संकल्प नी आवे। पलङ्ग शूं कोठरी में भी मुख्य सुख स्थान और चिक शूंअर्धोन्मीलित पणो सूचित व्हे'। प्रिय' के'वा शूं पति तो प्रिय है, परन्तु रिझावणो हीज बाकी है-
"राम परम प्रिय तुम सब ही के"
अर्थात् अतरो साधन व्हे' तो भी रिझावा वालो तो खुब (अहन्ता) है, सो जदी हूंश्यारी शूं अर्थात् विवेक शूं आत्म निवेदन करे, जदी प्रिय (ईश्वर) रीझे। वणी रे रीझवा शूं वींने भी (रिझवार ने भी) आनन्द व्हे' अर्थात् दोयाँ रे मिललाव शूं एक आनन्द री प्राप्ति व्हे' सो ही फल है। अणी में राजेश्वर योग है-
राजविद्या राजहुह्यम्‌। -गीताजी
अणी श्लोक रा विशेषण सब ईं में मिले है।
(2)
आपणी हट कुण छोड़े ?
प्रसव वेदना पाय स्त्री, लोक हास्य पाय कुञ्चुकी, अनेक वेदना पाय लोभी लोभ, मद्यपी मद्य, यूं ही जदी व्यसनी व्यसन में ही आपणां प्राण दे' दे', पण हट नी छोड़े। संसार रो उपहास भी सहन करले', ने शरीर रो, मन रो दुःख भी, तो भी नी छोड़े। ज्यूं संसारी अविद्या ने अनेक उपद्रव व्हेवा पे भी नी छोड़े, यूं ही महात्मा आपणी हट नी छोड़े जदी ही परमार्थ प्राप्त व्हे'-
'हठ न छूट छूटे वरु देहा'- मानस

(3)
एक माहत्मा ने एक दुष्ट मार्या, खूब हँसी कीधी। फेर पूछ्यो आप वीं वगत कई करता हा, जदी म्हूं आपने मारतो हो। महात्मा कियो म्हूँ भी म्हारा शत्रु ने मार रियो हो। मतलब, क्रोध ने म्हें भी वीं वगत खूब मारयो। महात्मा अणी वृत्ति (क्रोध) ने ही शत्रु समझे है औरने नी।
(4)
अविद्या रो लक्षण अशुचि, अनित्य, अनास्म। दुख में ईं री उलटी भावना रो नाम है, तो या आप में है, के नी है तो अविद्या है, वास्तविक नी है. सो झूठी बात क्यूँ विचारणी।
(5)
प्रकृति ही अनेक तरह री दीखे।
एक भूँगली में काच रा टुकड़ा पड्‌या रे। वींने फेरे ज्यूँज्यूँ ्‌नेक तरे' रा फूल दीखे। यूँ ही गुण रा तारतम्य रा अनेक शरीरादि दीखे।
(6)
कणी मन शूं स्मरण कराँ ?
जणी मन शूँ दोड़ता खरगोश रे गोली दाँ, जणी मन शूँ स्त्री सुख रो अनुभव कराँ, जणी मन शूँ स्मरण करां तो एक दिन ही में ईश्वर प्राप्ति व्हे'।
(7)
ममता रो प्रत्यक्ष दृष्टान्त
स्त्री एक जाति री कन्या व्हे' है। वीं शूँ आपणो कओी सम्बन्ध नी हो, पण विवाह व्हियाँ उपरान्त वींरा दुःख में दुःख, सुख में सुख व्हे'। पे'ली वीं ने दुःख सुख व्हिया' वाँ रो विचार नी व्हियो। एक राजा एक आदमी ने 100 रू. बगश्या तो दूसरो आदमी आयो वीं ने कियो, थूँ वी वगत व्हे' तो तो थने पण रुपैया मिलता। वो आदमी उदास व्हे' गयो। एकआदमी न रुपैया दे' पाछा लीधा, वो लड़वा ने त्यार व्हियो। ममता अतरी झट लिपट जाय है। यूँ ही शरीर पे समझणी कुछ दिन ताबे यो शरीर ईश्वर आपाँ ने वगश्यो है, सो कल्याण करलो, ने ईं में दुःख वा हानि व्हे' तो मत सोचो। वी रो है वो जाणे।
(8)
सततोत्थित (विष्णु सहस्त्र नाम)
सर्वकाल में सावधान रे'णो। चित्त री वृत्ति जाय तो पण गफलत शूँईश्वर ने (दृष्टा ने) नो भूलणों। पानो हवा शूँ हाले तो कई डर नी, पण टूट्याँ केड़े छेटी जाय पड़ेगा।

(9)
चोरां ने पछाणणो।
ईश्वर रा स्मरण में जो विकल्प व्हे' वी सब चोर है। ईं शूँ यांने रोकणा चावे। जणी वगत आदम उत्थित नी व्हे' वणी वगत ई चोरी करे तो सावधान रे'णो।
(10)
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यत् कर्तु मर्हसि। -श्री गीताजी
काम करवा में केवल स्वार्थ पर व्हेवा शूं बन्धन व्हेवे, निष्काम कर्म ही विशेष है, सो ईश्वर री आज्ञानुसार करुँ हूं। वा यो व्हे' वा नी व्हे'। ईं में कुछ विचार नी, केवल लोक संग्रह वास्ते ईं काम में प्रवृत्ति व्हियो हूं, इत्यादि विचार राख करवा में चित्त शुद्ध व्हे'।
(11)
शरीर पे ममता किसतरे' व्ही' ?
ज्यूँ आपणा विचार पे ममता व्ही', बाद में स्वपक्ष पे ममता व्हे' ही जाय है, ने वो ही पत्र दूजाँ रो व्हे' जदी फेर खण्डन भी करे।
(12)
मन को मौन कराय के, मुख सो बोलो बात।
मुख मौनी मन में बके, यही जीव की घात।।
--निजकृत
(13)
स्मरण करती समय जदी दूसोर संकल्व आवे जदी नाम ने प्लुत (जोरशुँ) उच्चारण कर, वीं संकल्प ने नाश कर देणो। ज्यूँ सिह गरजड, ने हाथी ने नाश कर दे। म्हारा में कई विशेषता है, जो म्हूँ अश्यो ही हूँ (भावना शूँ।)
(14)
नाम रे अन्त रो वा आदि रो अक्षर खूब प्लुत (जोर शूँ) करणो। प्लुत अक्षर रा उच्चारण रो मन में विचार व्हे'। यूं प्लुत रा अन्त रा अक्षर ने ध्यान शूं बोलणो।
(15)
मुक्त तो स्वतः है ही, बन्ध तो व्हिोय ही नी, जदी मुक्त कई व्हे'।
(16)
ईश्वर रो विचार।
कोई केवे ईश्वर अश्या है। कोई केव अश्या है। फेर आपस में लड़े। हिन्दू, मुसलमान, ईशाई आपणी आपणी ढोलकी आपणाँ आपणाँ राग री केणावत् कर रिया है। पण, ईश्वर रो विचार यूं करणो चावे, के वो बुद्धि शूं परे है, ने जतरा मत है, बुद्धि मे है। ईश्वर छोटो है, तो या विचारणी, यो तो बुद्धि रो कार्य है, फेर वो तो ई शूं अलग है। फेर म्होटो है, तो यो भी उली आड़ी रो विचार है। जदी शून्य है, तोय ो भी ऊलो अनुमान है। कई है वा नी है। जतरी वातां है, सब ऊली आड़ी री है। ईं शूं आप ने भूलो याँ विचाराँ ने भी छोड़ो। बस, पछे रेवे सो ईश्वर है। वेद भी प्रत्यक्ष वी ने नी के' शके वा जी है, नी है, सब ईश्वर ही है।
(17)
या तो सब 'म्हूँ हूँया 'म्हूँ' कई नी हूँ। ईरो निश्चय वासिष्ट में है। सब 'म्हूँ हूँ, ज्यूँ पृथ्वी पृथ्वी सबेक है गन्धत्व शूं। यूँ 'अहं' 'त्व' शूं सब 'अहं' है। कई नी' यूं के'ई' रो कोई कार्य नी दीखे, वा जड़है, सो कई नी व्हियो।

(18)
शास्त्र पेंलली के'वे मरोगा, पछे के' वे नी मरोगा। याने अज्ञान में रो'गा तो मरोगा। ज्ञान व्हे'गा तो नी मरोगा। वा यो स्वतः ही या जाणे' म्हूँ कदापि नी मरुं हूँ।
(19)
वैराग्य।
आपाँ बहात कराँ औरां रो, आणँ री वरसी कोई और। -प्राचीन।
ज्यूँ आपाँ विचार वो दुखी है, मर जायगा। यूँ वो पण कणी रे वास्ते एक दिन विचारती हो ने आपणए वास्ते पण कोई यूं विचारेगा।
नाम कुल कल्पित नाम विना रूप नी सर्व कल्पित है।
(20)
मोक्ष प्राप्त पुरुष कश्यो व्हे ? कई वीं रे माथे शींग उगे, कई वो कई नी खाय ? कई वो मौतनी व्हे' ? कुछ नी। केवल वो नी रेवे। ज्यूं कणी नोकर रो नाम काट दे, जठा केड़े वो नोकर कई काम नी करे ? वो तो जीव ेजतरे नोकरी ही करेगा, पण आपणाँ अठा शूं वी ंरी नौकरी माफ व्हे गई। यूं ही शरीर तो काम करतो ही रे' गा, पण 'अहं' रो नाम कट गियो, पछे प्रकृति माफक वो शरीर करो वा मत करो। जो ावन ाकरवा वालो नकली जीव हो, वो आपणो चार्ज पाछो असली ने दे' देगा। वा ेक आदमी वीं रे नीचे आदमी कुछ नी समझतो, वीं रा नाम शूुं छापवा रो कार्य करतो हो, ने वो बपेसमझ यूँ जाणतो हो, म्हारो मालिक कई करे, सब म्हूँ ही करूँ हूं। पर वो यूं विचारे तो भी मालिक ही करे, नी विचारे तो भी मालिक ही करे, वो तो केवल अभिमान करे-
फोद्यो पग ऊंचा कर मत गिर पड़े आकाश।
ज्यूं कपट पुरुष विचारे म्हूं खेत राखूं, कूकड़ो बोले जठे ही प्रभात व्हे' या वात तो नी है। अणी तरेही शरीर रो नामो काट दीधो जाय, याने ईं शूं कोई सिलसिलो नीं रे। पछे ईं री मुरजी व्हे' सो करो। करवा वालो जाणे ने करावा वालो जाणे जतरे यो रेवे करुं, नी करुं जतरे बंध ही है। केवल यो विचार चावे स्वतः प्रकृति शूं व्हे' सो वो कोई जनमे कोई मरे। कोई सुख देखे कोई दुःख देखे, ईंमें एक हीज म्हूं क्यूं !

(21)
काम कोटवालो शिखाय दे'।
ज्यूं मनख परमार्थ विचारे ज्यूं ज्यूं स्वतः वीं ने ईं में समझ पड़े।
(22)
नालायक रो नाम काट दो।
ईं शरीर रो नाम काट दो। यो ही कुबुद्धि करे है। पछे ईं री मरुजी व्हे' जो करो, पाछो नी राखणो। देखोगा तो पाछो आय जायगा।
(23)
शरीर री याद वृन्दावन रा वाँदरा ज्यूं।
कोई आदमी श्री वृन्दावन रे' ने पाछो आवे, तो भी पगरख्याँ वा कोी चीज बारणेरे' जाय, यूं याद आवे के वांदरा ले जायगा। यूं ही, 'अह' वा शरीर घड़ी घड़ी रो याद आवे।
(24)
वालो दूखे है।
भागता चोर रो घणी पग पकड़ लीदो। चोर कियो म्हारे वालो दूखे है। वणी छोड़ दीधो। यूं ही घमा दिनां री वृत्ति संसारी व्हे'गी, सो अकस्मात् विना विचारयाँ संसार ने सत्य देखाय दे' है।
(25)
आंगली पकड़तां पूंछो पकड़े।
मन में कुछ ß संसारी वृत्ति उठी, के वा नरी वृत्तियाँ पैदा कर दे'गा सो पे'ली ही नाश कर देणी।
(26)
ऊंध्या ने डाकण आई।
छोरो डर गयो, सो वीं नखे शूरवीर वींरो मिटावा … नींद आवे तो चमक उठे. यूँ ही माया (म्हूं) शूं वासिष्ठादिक मिटावे पण गफलत में ही लेवे।
(27)
गोखड़िया खड़िया रह्या, कड़िया झांकण हार।
खड़ खड़िया पड़िया रह्या, खड़िया हांकण ……1……

(28)
कुत्तो रोटी रा लालच शूं घ में आवे, लकड़ी रा डर शूं पाछो , पण अहङ्कार दुःख ने शरीर में आवे. ई शूं जाणी जाय के यो आपणाँ कर्म , छोड़े तो कुण … आछा आपणाँ पे ममता रेंवे हीज, चाहे मार न्हाको।
(29)
दुःख दाइ सहाय करे नरसो, जिहि के दुःख ौरहु झेलनो है ?

मानसिक सेवा यूं व्हे'णी चावे, के ज्यूं आपाँ कणी वस्तु ने देखाँ, यूं ही मन में विना सेवा करणी।
(30)
ईश्वर री समझ।
दीवाली रा दिनां में एक लालटेन रे वच्चे एक सुई में एक चक्कर , ने वींपे वींरे हाती घोड़ा चेंठावे। वी हवा शूं फिरे। का लोगाँ ने वाँरी छाय दीखे। फेर देखवा शूं मण्डल दीखे। फेरध्यान शूं दीवो ही दीखे ने सुई दीखे। अगर दीवो नी व्हे'तो कईं नी दीखे. मेजिक लालटेन ज्यूं वणी प्रकाश शूं जड़ माया में अनेक पैदा व्हे'।

(31)
ममतादि रोकवा रो साधन।
शतरञ्जआदि खेल प्रत्यक्ष है। वाँ में ममतादि रोकवारो साधन कर पछे वाँरा दृष्टान्त शूं यो समझणो।
(32)
एक शतञ्ज शूं नराी खेल गया। यूं ही घर, स्त्री, पुत्र, धन, पृथ्वी आदि मं नराई मनुष्यां ऊमर वीताय दीधी, ने मर गया, पर यो खेल हाल पूरो नी व्हियो। हाल तक नवो नवो ही दीखे। खायो थकी फेर खावा रो मन करे है। देख्यो देखवारो, परश्यो परशवारो, यूं ही कीधो न त करां पर वैराग्य नी व्हे'। ईं शूं कई मूर्खता ज्यादा व्हे।'
(33)
जींरो काम जींने छाजे, ओर करे तो डण्डा वाजेओ।
माया ईश्वर री है, वो अनेक तरे' शूं ई रो समेटणो फेलावणो करे। वच्चे ही जो केवे, यो म्हूँ करूं, ने सजा पावे। नाहरी नखे नाहर रो वच्चो देख मूरख गयो सो खायगी।
(34)
संकर्षण सो जीव है, वासुदेव शुद्ध।
मन प्रद्युमन जानिये, अहङ्कार
नारद मत शूं यो निश्चय व्हेवा शूं मुक्ति व्हे' जाय।
(35)
पैसा कोड़ा वासते, फिरयो …
मूरख मोल न जाणियो, हीरो तणो ……1……

हीरा=मनुष्य-जन्म, पैसा-कोडी=संसार ने स्वर्ग सुख, हजार-मोल=ईश्वर।

(36)
श्री प्रह्लाद जी री कथा शूँ उपदेश।
संसार, हिरण्य कश्यप। ईं शूं अनेक दुःख सुख जीवाँने व्हे' पण प्रह्लादजी री नाँईं जीव रो विचार चलित नी व्हे'णो चावे। केवल नाम में हीविचार रे'णो चावे। चाहे शरीर ने दुःख व्हो' वा सुख, तो ईश्वर अवलश्य दर्शन दे'। जश्या हृदय में शूं प्रकट व्हे'।
(37)
अहं ने ईश्वरार्पण करो।
हे मन थूँ अत्यन्त दुखी व्हियो व्हे' अगर थने दुःख शूं जो नराी समय तक देख्यो सो कुछ व्ही'व्हे' ने अपार पाप थारे नखे व्हे' और वाँ शूं छूटणो सहज में चावे तो कुछ श्री व्रजराज रे कर। अगर थां सूं व्हे' शके तो एक अन्य-मन्या री चीज वताऊँ हूं। ने वीं ने अर्पण कराव शूं श्री व्रजराज अश्या प्रसन्न व्हे' के जश्या शूं व्हे' ने वीं ने जतरे थूं राखेगा वतरे ईश्वर कदी थारे पे पूर्ण प्रसन्न नी व्हे'गा ने वीं शूं थारो कई काम अटके ß नी, वशी थरो तीरे असंख्य वस्तु है, सो वीं मेली एक ईश्वर रे अरप्ण करवा में क्यूँ संशय करे है। वींरो नाम है, एक चित्त री वृत्ति। जदी के चित्त में असख्य वृतियाँ है, तो एक वृत्ति ने काम में नी लावे तो कई अण सरियो जाय है। घणा मनुष्य छोड़े। कोई आदमी एक गेले आवतो जावतो हो। वठारा लोगआं वीं पे मिथ्या रो सन्देह कीधो, तो वींरे कणी कियो अठी जावा में नुकसाण है। वणी वो गेलो छोड़ दीधो। दूसरी आड़ी जाणो आवमओ कीधो. वीं रा मन में वीं गेलारी याद अ्‌यास शूं आय जाय तो झट रोक दे' ने दूसरे ही गेले जाय। क्यूंके वठी कई फायदो नी, अठी कई नुकसाण नी। यूं ही एक चित्त री वृत्ति ने ईश्वर रे अर्पण करणी है। या थने पे'ली विचार लेणी चावे, के वृत्याँ मात्र ही कुछ नी ! वीं में शूं ß ेक अहं वृत्ति ने ईश्वर रे अर्पण कर दे', कर पाछी ले'मती। जो शूं आय जाय, तो झट पाची ईश्वर री वस्तु जाण त्याग दे'। देख थारे वाग देखवा रो इच्छा व्ही' ने नीं गयो जदी तो थने कुछ दुःख नी व्हियो। यूँ ही अनेक वृत्यां में शूं कतरी नाश व्हे' जाय जदी थने दुःख नी व्हे' ने एक अहं वृत्ति रे वास्ते व्यर्थ अतरो कष्ट उठावणो सिवाय मूर्खता रे और कई है। ईंं रो विचार सांख्य योग में है। श्री स्वयं आज्ञा करे हैः-

सर्वधर्मान्परित्ज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।
गीताजी।
रोगरी वृत्ति नष्ट व्हेवा पे, हर्ष करे, ने अहं वृत्ति पे शोक क्यूँ करे।
(38)
स्वप्न विचार।
ईं संसार में जी पदार्थ दीखे, सो है, के नी, स्वप्न में जो दीखे, सो है, के नी, स्वप्न में हाती दीखे, वीं वृत्ति ने रोक्यां केड़े हाथी पर्वतादि नी दीखे। फेर वा वृत्ति फुरे ने पाछा दीखे। यूँ ही संसार रा पदार्त है। कुछ अनत्र नी है। केवल दो ही वृत्तिमय है।
(39)
माला रो एक मण्यो पकड़यो ने 108 ही मण्याँ वंडे लारे आय जायगा। एक वृत्ति साँय.ी मानी ने साँची व्हे'वेगा। ईं शूं वृत्ति मात्र ही मिथ्या, ने मिथ्या, या मिथ्या, ने सत्य या मिथ्या-
- सत्या नृते त्यकत्वा" --
(40)
पे'रा वाला सूं जाणी जाय धन है, ने चोर है, वृत्यां शूं जाणी जाय ईश्वर है, ने संसार है।
(41)

एक हेलो पाड़े दूसरो जाय वो जाणे म्हने हेलो पाड्‌यो। यूं हीं ईश्वर री माया ने कोई कई, कोई कई समझ लीधी है।
(42)
अहं ने लेवा कुण जाय।
जदी यूं विचार कीधो के यो जो "अहं" है, ई ंने श्री कृष्णार्पण करूँ हूं। म्ह व्हे' पाछो कुण लेवे. क्यूँके पाछो लेवे-देवे सो तो खुद ही व्हे' गयो।

(43)
अहं रो कई लक्षण है ?
जो लोही-मांस युक्त शरीर ही अहं है, तो बकरा कुत्ता में भी अति व्याप्ति व्हे'गा। जो नराी विशेषणाँ शू ंयुक्त करने एक शरीर ने हीज अहं ासबहत करां, तो वीं मायला विशेषण कम पड़वा पे, वा (अव्याप्ति) 'अहं' व्याप्ति आय जायगा। ज्यूं पच्चीस वर्ष रो अस्यो अश्यो म्हूँ हूँ तो चोईश वर्ष रो ने छाईश वर्ष रो म्हूँ नी व्हियो। ईं शूं लक्षण रहित व्हेवा शूँ अहं कुच वस्तु नी व्ही'। बन्ध्या पुत्रवत् यूँ ही मम भी भ्रम मात्र है।
(44)
बाँदरी रो बच्चो अणजाण में भोंकी (टोला रा बड़ा बाँदरा) नखे चल्यो गयो, वो मारवा लागो। बच्चो वीं ने गाड़ो-गाड़ो पकड़वा लागो। बाँदरी छुड़ावे, तो भी वी नी छोड़े। अगर वीं ने छोड़, बाँदरी नखे चल्यो आवे, तो बच जाय, दूज्यूँ भोंकी मार न्हाके। यूं ही भोंकी=शरीर, बच्चो=मन, ने बाँदरी=ईश्वर है।
(45)
पाणी री बूँद समुद्र में शूं पाछी काढ़े तो खबर नी पड़े के या वा हीज है, सो सुषुप्ति शू ंजाग यूं भे'म करणओ। पे'लो वालो अहकार गम गयो, यो तो दूजो है। वा ज्ञान शूं नष्ट व्हेवा पे यो अहं दूजो है, वो म्हूँ तो मुक्त व्हें गयो, ने दूजा तो नराी जनमे-मरे है।

श्रद्धा
तमोगुणी जीवाँ शूँ रजोगुणी विशेष, रजोगुणी शूँ सतोगुणी, पशुआँ पे मनुष्याँ रो अधिकार है। याँ मनु,्‌याँ पे भी सतोगुणी देवाँ, ऋषियाँ रो अधिकार है। परभाते सतोगुण रेवे वीं वगत विचार उत्तम व्हे'वे। नशा में तमोगुण ज्यादा बढ़े। वीं वगत रीवात कोईनी माने। तो ईं वास्ते जो जो सतोगुणी ऋषियां परमार्थ विचार री आज्ञा करी है, सर्वथा मान्य है। ईं वास्ते आपाँ भी जदी ज्या वात सतोगुण व्हे'वा पे विचाराँगा वा वात शास्त्र सम्मत ही व्हे'गा।
(47)
अहंकार ने देखता रे'णो, यो काम अहंकार कीधो, यो मन, या बुद्धि, और देखे तो वो ही विना बोल्यां कणी चीज ने देखाँ, यूँ मन में भी विना बोल्यां रे'णो बस, या बोले सो ही माया, ने देखे सो ईश्वर।
(48)
सर्वनाम
व्याकरण में सर्वनाम संज्ञक शब्द व्हे' है। वो वास्तव में सर्वनाम है-सबाँरा नाम है, तो आँपणो कई व्हियो। अहं भी सर्वनाम है, इदं भी सर्वनाम है, त्वं भी सर्वनाम नाम है। यूं ही मम, त्वं, तस्य, विश्व आदि सब समझणा। आपाँ भी सर्वनाम है-
सर्वनाम जो सर्व तो, गर्व कौन को होय।
सर्वनाम ते रहित अरु, सर्व लखे सो सोय।।
मनुष्य दुःख वा सुख रो अनुभव करे। जदी वो विचारे म्हूँ सुखी हूँ, वा दुःखी हूँ। वीं वगत यूं विचारणो चावे अहं दुःखी वा सुखी है। वा मनने अनुभव व्हे', वा अहं ने व्हे', सो अहं ने तो सर्वदा व्हियो, ने व्हे' तो ही रे'गा। याने अहं भी जड़ ईश्वर शूं अलग व्यापक है। मन री वृत्ति व्हेवा शूं।

शंका-अहं जो व्यापक है, तो एक समय में सर्वत्र एक दम सुख दुःख व्हे'णो चावे ?
(49)
वा यूं विचारणो चावे ज्यूं अतरा 'अहं' है, यूं यो भी 'अहं' है। ज्यूं ई 'अहं' पे म्हारी मजबूती है, यूं शारा पे ही है। ज्यूं देवदत्त मानवा वाला 'अहं' रो सुख-दुःख है। यज्ञदत्त माँदो पड्यो, असह्य वेदना व्ही' सो वीं ने यूं नी विचारणो चावे, के यूं ्‌गर देवदत्त माँदो पड़े तो वीं ने भी व्हे'। ज्यूं यज्ञदत्त अहं ईं ने नी चावे, यूँ ही देवदत्त भी ईं ने नी चावे, नै प्रमाददत्त भी नी चायो। ईं शूं यो एक लक्षण सर्वत्र व्हेवा शूं जाणी जाय, के 'अहं' एक ही है। लक्षण एक मिलवा शूं दूसराँ रो दुःख देख आपणो भूलवा रो यो ही अर्थ है, के यो सर्वव्यापी नियम है। मतलब, ज्यूं अतरा 'अहं' है, यूं ही यो भी एक 'अहं' है। पूण ज्ञानी वो है, के आपणाँ शीरर पे वास्ते केवे वो शरीर है। क्यूंके यो शरीर, के'णो भी कुछ निीकटता सूचित करे है। ज्ञानी रे भावे सब शरीर समान है, तो एक ने यो, ने एक ने वो, क्यूंके' वे, यो ही बन्धन है। एक शूं नजी'क रे'णो औरां शूं छेटी रे'णो यो तो अज्ञान ही है। ज्ञान में या ही ज वात है, के सर्व समान दीखे-
ज्ञान वान जह एको नांहि।
दीख ब्रह्म समान सब मांही।।
--श्रीमानस
मतलबस सर्वनाम है। ईं में न्यारापणो नी व्हे' सर्वनाम है, सब री समान सत्ता याँ पे है।
(50)
यूं विचारणओ चावे, के अतरा विशेषण वालो "अहं" यो कार्य कर रियो है।
(51)
सब संसार रो सम्पूर्ण व्यवहार नाम शूं व्हे'। नाम सो निस्सन्देह कल्पित है।
(52)
सर्व सर्व गत सर्व उरालय- श्री मानस
---
229 वो विचार देखो। (सर्वनाम) विचार
(53)
नाम रूप हुइ ईश उपाधी- श्री मानस
रुप आधार, ने विचार सार, याँ दोयाँ रलो ही प्रकाशक ब्रह्म है।

(54)
नाम स्मरण शूं ईं वातां समझ में आवे, एकाग्र चित्त शूं। विचार भी विचार योग्य है।
(55)
आपां या विचाराँ, के म्हने अतरा संकल्प क्यूं व्हे' तो या विचारणी चावे, के जदी अहं ही सकल्प मात्र है, तो ईं ने फेर कई संकल्प व्हे'। विचार तो असंख्य है, यां ने कुण रोक शके। ईं तो प्रकृति पुरुष रो खेल है, केवल अहं ही अनाशुरती आयो थको अनर्थ मूल है। विचार युक्त तो कई नी है। विचार सब में है, विचार शरीर में नी है।
(56)
अथवा यूँ विचार राखमओ जो कुछ व्हे'रियो है-ईश्वरेच्छा शूं है। अहं स्वतन्त्र नी है। जो पराधीन है, वीं ने सुख दुःख रो कई विचार। विचार ने सत्ता देवा वालो वो ही है। ज्यूं सूर्य प्रकाशक है।
(57)
मद्य मांस रो त्याग।
मद्य सूं अविचार पैदा व्हे', सो अविचार नीव्हेवा देणो, अविद्या शूं वचणो। मांस (शरीर) शूं ईं ने अंगीकार नी करणो। स्थूल मद्य मासं त्याग शूं भी यो मतलब व्हे' शके है। यदि उपरोक्त त्याग नी व्हिटो, ने यो ही त्याग व्हिटो', तोवात मामूली ही है। स्थूल शूं सूक्ष्म प्राप्त व्हे' है।

(58)
एक श्लोक, कणी चाक्य नीति में देख्यो। कणी पञ्चतन्त्र में देख्यो। एक केवे यो पञ्चतन्त्र रो है, ने एक चाणक्यो रो केवे। वास्तव में जणी जीं ग्रन्थ में पे'ली देख्यो वींरो ही मान लीधो, परन्तु है वो श्लोक भारत रो। यूं ही नरा समय शूं अभ्यास पे'ली संसार रो व्हेवा शूं संसारह ही दीखे, ने ईश्वर ने भी संसारी बुद्धि शूं समझवा री कोशीस करे।वीं में भी कोई कणी दर्शन शूं, कोई कणी दर्शण शूं। पर वास्तव में चित्त स्थिर व्हेवा शूं मतलबह है। हरि भारती जी आज्ञा कीधी, के एक मग मन पे दो, दूजो ईश्वर नखे ही पड़ेगा। कोई जुगाव के'वे कोई गुजाव के'वे। वो वीने, ने वो वींने हंशे। जो बुद्धि में प्रथम दृढ़ व्हे' गयो, वींने ही सत्य मान लीधो, ने दूसरो सब असत्य। पर बुद्धि युक्त पक्षपात छोड़ घड़ी-घड़ी रो अभ्यास करवा शूं सही वात मन में जमेगा।
(59)
एक आदमी गेला में टोपली पड़ी देख माथा पे उठाय लीधी। वो जाणतो, के या माथा पे उठावे है। फेर ईं में कईक पड्‌यो भी रे' है। सो गेला में काँकरा देखे, वणा ने ही माँयने भरे। यूं बोज शूं दुःख पाय रोवा लागो। एक बुद्धिमान कियो, टोपली फेंकदे। वीं कियो ऊँचे नी है। वमी कियो एक एक काँकरो फेंकदे। यूं ही फोरो व्हे' गयो, फेर टोपली भी फेंक दीधी। यूं ही शरीर पे अनेक ममता रूपी काँकरा भर दीधा। याँ ने छोड़वा शूं सुख व्हे'गा।
(60)
अङ्कार केवे यो विचार म्हूं करूँ हूँ, यो म्हने सुक रो विचार व्हियो, यो दुःख रो, तो सुख दुःख क्यूंनी केवे, के यो म्हने अहङ्कार व्हियो। ज्यूं अतरा विचार ज्यूं ही अहं। फेर ईं ने विशेष, औरां नेईं रे आधीन मानणो-
पड्क्तेहि भेदो न पुनः शिवाय।

(61)
अहङ्कार ने कागद रो दीवो, ईश्वर ने हवा। अहङ्कार ने शरीर, ईश्वर ने जीव। अहङ्कार ने रेल, ईश्वर ने अंजन इत्यादि समझणो चावे। याने अहं में सत्ता ईश्वर री है, अबे अहं कई करे।
(62)
कामना व्हे' तो यूं करणी।
कदी ईश्वर दर्शन देगा। क्रोध, ईर्षा, विषय, मोह आदि शत्रु है। याँ ने ज्यूं व्हे' ज्यूं मारणा. यूं ही सब यरमार्थ मे ंकरणा। श्रृङ्ागर में श्रीकृष्ण चरित्र विचारणो।
(63)
श्री रघुनन्दन, रावण रा माथा आकाश रा आकाश में ही राख्या। रघुवीर तोर प्रचण्ड लागहिं भूमि गिरत न पाव ही। यूं ही अहङ्कार, ममताआदि ने शरीर पे नी आवा देणो। विचार रूपी नाराच (बाण) शूं ऊँचा ही राखणा. वैराग्य शूं नाभी रो अमृत सुखाय देणो।
विषय वासना नाभी सर।
(64)
राजकन्या रा ध्यान शूं भंगी नाम जप्यो। ज्यूं संसारी इच्छा में ईश्वर प्राप्ति री इच्छा प्रबस करणी।
(65)
सोच मूर्खता विना नी व्हे' के, गईवात रो विचार करे तो वीं रो कई सोच है। उद्योग री शास्त्र में आज्ञा है, सोच री नी। नी व्ही, ने व्हे'गा। वींरो कई शोच, मूर्खता विना शोच नी व्हे'। चावे जो दुःख पड़ो।
(66)
शास्त्रोक्त बुद्धि आपणी निश्चय कर लेणी, फेर वीं ने हटवा नी देणी। यो ही दृढ़ निश्चय वाजे है। निश्चय यो राखणो, के ेक ईश्वर है, वीं री माया सम्पूर्ण दृश्यादृश्य पदार्थ है। आपणी बुद्धि पे दूसरां री बुद्धि आरूढ़ नी व्हे'णी चावे।

(67)
शतरञ्ज ने या जाणा हां, के छींतरा व गोटा री है। रमणा लकड़ी रा है, ने खेरादी वणाया है, ने आपणां चलाया चाले है। पण बुद्धि में यो निश्चय व्हे' गयो के यो मो'रो यूं हीज चाले आदि। अबे वीं में हर्ष शोक व्हेवा लागो जदी वी खेले. कोई मनख जो ईंरा कायदा ने तुच्छ जाणतो हो, ने बुद्धि में दृढ़ नी कीधा है। वणी कियो, वजीर ने मार न्हाको। या शुण खिलाड्‌यां कियो यो तो नी मर शके। वणीं एक प्यादी उठाय छेटी रा बेठा वजीर ने मार न्हाक्यो। लोगां वींने कियो, थूँ मूर्ख है। खेल नी जाणे। वीं कियो म्हारे खेलणो थोड़ी ही है। जो म्हूँ भी थाणीं नांई खेल तो, ने ई वृथा बुद्धि रा निश्चयत्वरा बन्धन में आवतो, यो यद्यपि म्हूं सुखी हूँ, पण अबार कृत्तिम सुख दुःख में उलझणो पड़तो। थाँणे वास्तविक कई हानि लाभ व्हियो सो थें हर्षशोक करो। यूं ही संसार-शतरञ्ज, वींरा पदार्थ=मो'रा, अज्ञानी=खिलाड़ी, ने ज्ञानी=मध्यस्थ व्हे'। अगर वी मो'रो ने नी चलावे, वा यूँसमझ जाय, के ईं तो यूँ रा यूँ ही है। नी, लाल म्हारा ने वींरा, तो भी हर्ष-शोक नी व्हे'। ब, ई पूर्व भुक्त पदार्थ आपां अठीरा उठी कर हर्ष-शोक पाय चल्या जावाँ। फेर जो शतरंज पड़ी देख, ने वी भी खेल हर्ष-शोक पाय चल्या जाय। यूँ ही संसार रूपी महाशतरञ्ज शूं कतराई खेल गया, खेलरिया है, ने खेलेगा। बुद्धिमान यातो अणाँ मो'राने आपणां नी समझे, या रुयाल जाणे, या अठी रा उठी नी मेले, या हर्ष-शोक नी करे। यथार्थ तत्त्व समझ लेवे जीं शूँ। ने निर्बुद्धि तो लड़वा लाग जावे ने आप हार जीत माने। ईंमें, संसार में बिलकुल फरक नी है। ईं वास्ते सात्त्विक बुद्धि रो ही आश्‌ारय चावे। क्यूँके वा यथार्थ है। प्रत्यक्ष खण्डन, यो पदार्थ है, ईंमें कई प्रमाण ? याने पृथ्वी है, ई में कई प्रमाण ?
उत्तर-गन्ध है जीशूँ।

प्रश्न- गन्ध है ईं रो कई प्रमाण ?
उत्तर-नासा है, जीं शूं, तो अन्योन्याश्रय दोष व्हियो।
वा यूँ दोयाँ रो प्रत्यक्ष मन शूँ, मन रो बुद्धि शूँ।
बुद्धि रो तो पे'ली वर्णन व्हे' गयो।
प्रश्न-पृथ्वी रो कई लक्षण है ?
उत्तर-गन्ध।
प्रश्न-गन्ध रो कई लक्षण है ?
याने जो कुछ है बुद्धि है, याने आपणो निश्चय ही है, वास्तव में है, सो ही है, जी नी केणी आवे। पृथ्वी नासा आदि पूछता ही रे'णो, के ईंरो कई प्रमाण ? बस।
(68)
कोई जोरी शतरञ्ज खेलती ही, वी नाजोरी खेलवा वाला शूं, खेलाव लागो। वो नाजोरी वालो वीं रो रमणओ मारे। वो के'ईंरे तो ईंरो जोर है। वो के' आपाँ खेलती वगत निश्चय कर लीधी है के नाजोरी खेलाँगा। फेर वो रमणी चाले ने यो मार ले' ने वो केवे जोर है। यूँ ही शेज में हराय दीधो। जोरी संसारिक, नाजोरी-वेदान्त, परमार्थ, नाजोरी उचित है, के नाजोरी वालो जोरी शतरञ्ज नीं खेले दूज्यूँ हार जायगा। वास्तव में नी जोरी है, नी ना जोरी है। यातो माया री जोरी (जबर्दस्ती) है, ने माया ब्रह्म री जोरी (जोड़ी) है, या वात केवा री थोड़ी है। समझवा में ौर ही है। या तो समझता बेजोड़ी है, जो मनरी वाग मोड़ी है। वीं रींज बुद्धि अठी दोड़ी है, फेर तो गोपद शूं भी थोड़ी है।

(69)
एक ादमी चायो म्हारो नाम अखण्ड रे'। पण खुद नी रे'। जदी किस तरे नक्की व्हे' के यो फलाणा रो नाम है। कई जीं रो नाम कल्पना कररां वीं रो नाम शूँ कई सम्बन्ध है।
(70)
बालक पणा शूं ही विना शुण्याँ ही परमार्थ विचार पैदा व्हेट तो पूर्व जन्म रा संस्कार सिवाय और कई है। एक ही पुरुष रा छोरां ने एक समान राखवा पे भी जो भिन्न दीखे, तो अवश्य ही पुनर्जन्म री प्रतिपादक है। प्रेतादिक री वात ईं ने साबित करे है।
(71)
दृढ़ता व्हे' तो अवश्य भजन व्हे'।
प्रश्न-जाणाँ, तो हाँ, के भजन करा तो ठीक दृढ़ता शूँ, पण भजन नी व्हे'-मन अठी रो उठी चल्यो जाय। अगर यो मन दुष्ट चोड़े हाथ में आवे तो मार न्हाकाँ, पण अदृश्य है। ईं ने समझावा ने सब शास्त्र है पण माने नी।

उत्तर-यदि या दृढ़ व्हे' भजन करमओ, तो जरुर भजन व्हे शके है। मन रो साक्षी मन है पण या दृढ़ कोई करे नी। केवे के मन नी दीखे, तो कई अटकाव है। ज्यूं वन में शू'र नी दीखे, पण ओदी पे आय जाय, ओदी (शरीर पे पकड़ शकाँ हाँ। आपणे शास्त्र में दुष्ट मन ने पकड़वा रो उपाय साबत कर राख्यो है, वीं रो नाम है तपस्या। पञ्च धूणी तापमओ आदि अनेक है। क्यूँके मच्छी रे लारे लारे तोड़ने वीं ने कोई नो पकड़ शके, पण वा (मच्छी) खावार लोभ शूँ वा काँटाँ में उलझ जाय, यूँ ही मन स्वर्ग रा लोभ शूँ भी सत्कर्म कर शके है। आज काले लोगाँ देखावणी तपस्या रे'गई है। वीं सूं कई फायदो नी व्हे' शके।
प्रश्न-तपस्या शूं शरीर नाश व्हे' जाय तो ! क्यूंके आज काल रा मनुष्य तप रे योग्य नी है, ने तपस्या किस तरे' करणी ? (या पण नी जाणे।)
उत्तर-तपस्या शरीर ने नाश करवाने नी है, किन्तु मन ने वश करवाने है।ज्यूं णी दुष्ट घोड़ा व जानवर ने समझावणओ, कुछ शिखावणओ व्हे' तो केवल कूटयाँ करे, तो भी विगड़ जाय, ने नी कूटे तो भी विगड़ जाय। पण वो कुबद करे, ने आपणी आज्ञानुसार नी चाले, जदी जरूर वीं रे योग्य वीं ने सजा देणी, ज्यूँ माता बालक ने। यूँ ही मन शूँ स्मरण करावणो, ने जदी यो स्मरण छोड़ दे' तो एक उपवास कर लेणो वा एक सुई अशी चुभावणी के लोई निकल जाय। ईं शूँ मन ने दुःख तो व्हे', पण शरीर ने कई नुकासण नी व्हे' ने यूँ के ता जाणो या स्मरण ने भूल नै और काम में लागी, जीं री सजा है। बस मार आगे भूत भागे री के'णावत रे माफिक ईं ने स्वयं ही नाम याद वण्यो रेटगा, ज्यूं मदरसा में छोरा। पण दया करने छोड़वा शूं तो ईतर जायगा। ने यो प्रार्थना करे, के अबे नी करूं तो भी एक दाण तो सजा दे ही देणी। अबे नी करेगा तो नी दाँगा। दृढ़ता चावे।
(पारस भाग शूं)

(72)
यूं विचारणो चावे, के थोड़ी सजा शूं यो घमा दुःखां शूं वचेगा, बालक वा रोगी ज्यूं। ने यावत् दुःख मन रे वश नी व्हेवा शूं व्हे' है, सो सब दुःख प्रत्यक्ष दीखे है, संसार में। सो वाँ शूं भय करने जरूर ईं ने सजा देणी हित कामना शूँ।
(73)
समष्टि व्यष्टि।
जल एक समुद्र में है, वो समष्टि वाजे, वीं में शूं घड़ा में, लोठ्या में, वा कुंजा में राखवा शूं व्याष्टि वाजे, ज्यूं घटाकाश, मठाकाश। अब पिण्डे सो ब्रह्माण्डे रा न्याय शूं पृथ्वी री समष्टि मात्र पृथ्वी , ने व्यस्ठि शरीर गत माँसादि। यूं ही पञ्च तत्व समझणा, यूं ही अव्यक्तादि है। अव्यक्त री समष्टि विराट री अव्यक्त, ने व्यष्टि बुद्धि शूं पर अव्यक्त। यूं ही महतत्व भी समष्टि व्हियो, नी व्यष्टि भिन्न भिन्न बुद्धि, शरीर गत। यूँ अह आदि सब घटाकाश में, ने महदाकाश में कई अन्तर नी। पण ुपाधि शूं न्यारो न्यारो दीखे। यूं ही मन एक, ए, सब एक, पण विचार शूं न्यारो दीखे शरीर में अध्यास व्हेवा शूं शरीर भी एक, पण विना विचारयाँ अनेक ज्ञात व्हे'। एक वात ईं शूं या भी साबत व्ही' के घणां खरा जड़वत ईश्वर ने माने है, ने केवे वो अवतारादि नी लेवे। पणजदी वीं री व्याष्टि में या प्रहभाव है तो समष्टि में कतरो व्हे'णो चावे। आपाँ तो ईं पृथ्वी लोक री ही पूरी वात नी जाणाँ, जदी असंख्य नक्षत्र, ने वा शूं दीखे जो नक्षत्र, यूं परम्परा शूं माया रो पार कुण ले' शके। ईं शूं वीं री माया अपरम्पार है, ने छोटो सो वीं रो नकशो मनुष्य शरीर है।

(74)
सब ईश्वर है।
ज्यूं एक जलाशय मूँ अनेक ने'राँ, अनेक आड़ी निकले, ने अनेक रंग रोवीं पाणी में संयोग व्हे' तो भी जल, जल ही है।
(75)
चित्रवत् संसार है,
एक भींत पे अनेक रंग रो हाथी मांड्यो। भींत हाथी वगैरह कुछ नी केवल रंग ही रंग है। जुगाव-गुजाव-वत्‌।
(76)
बुद्धि रो निश्चय।
एक देश में पिता ने पुत्र, ने पुत्र ने पिता के'ता हा, ने या हीज निश्चय कर लीधी ही'। अठे आया जदी एक कियो यो म्हारो पिता है। लोग हंश्या, ने कियो, बूढ़ो बेटो बालरक बाप, फेर अठारा मनखाँ में शूं भी वणा पिता पुत्र ने पूछ्यो. थें कुण हो ? याँ बालकाँ ने पुत्र कियो जदी वी भी खूब हस्या, ने कियो बालक पुत्र ने बूढ़ो बाप, या भी बड़ा आश्चर्य री वात है। एक बुद्धिमान संकेतिक नाम छोड़ लक्ष्य समझग्यो। यूं ही घमां दिनाँ शूं शरीर ही करे। वा म्हूँ भी कुछ हूँ, या निश्चय जमगी सो शास्त्र री वात समझ में नी आवे। बुद्धिमान् स्थिर चित्त शूं मनन कर समझ लेट या ही-
बंध्यो कीर मरकट की नांईं।
-श्री मानस
समझवार तो जन्य जनक सम्बन्ध (पुत्र ने पिता रो सम्बन्ध) विचार झट समझ जाय। यूँ ही जड़ चैतन विचार शरीर चैतन नी व्हे' शके, ने चेतन जड़ नी व्हे' शके. ज्यूं वृद्ध पुत्र नी व्हे' शके, ने बालक पिता। यूं समझने वीं धारणार्थ यूं छोड़ अभिप्रायार्थ समझ लीधो।

(77)
संस्कार।
यो दीखे जो स्वप्न व्हे'गा, तोई आपणाँ सम्बन्धी है, ईं रो कई प्रमाण ? शायद लोगां यूं ही समझायदीधा व्हे'। समय रे साथ सब चल्या जायगा। यो कई है ? सब में हाँ। पाणी कई है ? यूं ही सब।
ब्रह्म।
योरंग है सो अविद्या है। पाणी है, सो ब्रह्म है। नं. 1 जीव, नं. 2 अज्ञानी जीव, नं. 3 ईश्वर, जींमें ज्ञान अज्ञान मय सम्पूर्ण संसार है।
(78)
अज्ञान में भय रात्रि वत्, प्रकाश में अभय ज्ञानवत् (दिनवत्)।
(79)
सुख रा समय ने व्यर्थ वार्तादि में वितावो, पर दुःख रा समय ने किस तरे' व्यतीत करोगा। जदी एक-एक घड़ी युग री चौकड़ी ज्यूं वीतेगा।
जदी एक-एक रुपयो जावा रो विचार करो, वर्ष रा वर्ष जाय वीं रो विचार क्यूँ नी करो। जो धन एक दिन अवश्य जायगा, वीं री उपाय में मनुष्यतन व्यर्थ क्यूं खर्च करो। ईश्वर रा भजन में क्यूं नी लागो, जो अठे ही अवश्य सुख प्राप्त व्हे'।
(80)
या नी जाणाँ के ईं उपाय शूं दुःख मिटे, जदी तो ठीक, पण जाण बूझ तो ईश्वर दीधी, फेर वीं पे विचार नीं करवा शूं दूणी सजा री वात है।
(81)
सर्वनाश।
समय जदी नी दीखे तो फेर ईं रो प्रमाण कईके अतरो जीव्यो, ने अतरा जीवांगा।
(82)
स्वप्न संसार में अन्तर नी है, तो कए सत्य एक मिथ्या क्यूँ ? दोई मिथ्या है। जो देख रिया है, वो ही सत्य है, दीखे सो नी।
(83)
दुःख देखे, ने सुख देखे, यूं कहै सो ठीक है। क्यूं के अगर नी देखे तो है ही नी। देखे, तो दीखे। दृष्टा है, सो ही है।
(84)
जदी यो कई नी है, तो उपदेश में या ही पदार्थां रो दृष्टान्त देवो सो झूठा रो दृष्टान्त क्यूँ ?
"गूंगे को समझाइये गूंगे की गति आन"
--वृन्द सतसई
(85)
म्हारो मोक्ष व्हे' तो ठीक।
एक महात्मा ने कणी कियो म्हारी मोक्, कर दो। महात्मा कियो। थाँमें शरीर, जीव, मन है। कींरो मोक्ष चावे ? शरीर लोही मांस-मय है। ईं को कई मोक्ष ? जीव ईश्वर एक है, तो कई मोक्ष। थने जीव दीखे भी नी है, फेर वीं रो मोक्ष शूँ कई प्रयोजन ? ने मन जी संकल्प विकल्प सर्वत्र करे ही है। वीं रो मोक्, किस तरे' व्हे ? पण एक मनरी वृत्ति अहं है। वा अज्ञान शूं दृढ़ व्हे'गी है, ने वणी एक शरीर रो आश्रय ले' लीधो है, ने संकल्प विकल्प जो मन करे। गेले ही चालताँ आपमा माने है। बस, वीं रे नाश व्हेवा पे मोक्ष व्हे'गा।

(86)
जदी सुख दुःखादि सर्वत्र प्राकृत नियम शूँ व्हे' तो म्हूँ कई सर्व हूँ ? म्हूँ कुछ नी।
(84)
अतरा विशेषण वालो हीज (्‌अहं) म्हूँ क्यूँ ? और म्हूँ क्यूँ नी। म्हूँ म्हूँ तो सर्वत्र है हीज, जदी म्हारो म्हूँ कश्यो है ?
(88)
नाम स्मरण करती वगत चित्त नी लागे, तो नाम गणता जाणो। ज्यूं राम राम राम यूं मन में ही गणणो ने मन में ही के'णो। मतलब, दूजा संकल्प मिटावा शूं है।
(89)
राम रे राम,यूं केवा में एकर नाम शूं दूसरा नाम रे' वच्चे जो है, वो ही ब्रह्म है। वठेचित्त ठे'रावणो। योगवासिष्ठ में भी है।
(90)
नाम ने अहं में तन्मय कर देणो। याने अहं याद रे सो ही अहं ने नाम ही समझणो।

(91)
राते स्वप्न आवे दिन में भी कुछ दीखे सो स्वप्न ही है। आधी देरयो, ने आधी देर यो, फेर एक ही सांचो क्यूँ फेर समय तो कल्पित है।
(92)
छेटी-छेटी दीखे, पण है एक ही जगा स्वप्नवत्‌।
(93)
ज्यूं अहङ्कार विद्यमान है, पण कारय् विना दीखे नी। ज्यूं अहंकार रो स्मरण कराँ यूं नाम रो। याने सब काम करताँ भी अहंकार ने कधी नी भूलाँ यूं ही नाम नी भूलणो विचार 90 में देखो।
(94)
एक राजा रे' ने दूसरा राजा रे सीमा रो झगड़ो हो। वणी राजा अश्या पेच न्हाक्या, के कुछसमय बाद वा सीम ईंरे आय जाय। पण यो मर ने वणींज राजा रे जनम्यो, ने समी जावा लागी। जदी ही जश्यो खुद रा कीधा काम। वा कोई गराश्या, लड्‌यो ने ईं, वीं री सीम दबाई, फेर वीं रे खोलयाँ गयो, ने ईंरे दूजो ईं रो शत्रु फेर, ईं जश्यो।

(96)
समय तो मन में व्हे' मन माया में-
सोई प्रभु भ्रू विलास खगराजा।
नाच नटी इव सहित समाजा।।
--श्रीमानस।
अणी वास्ते काल री गति तो मन रे वश में है, वणाँ तक भी नी है, तो ईश्वर तक किस तरे'। सूर्य आदि समय शूं है, सूर्यशूं समय नी। अब समय रो कईरूप व्हियो' ऊमर रो कई भरोशो ने अन्दाज।
(97)
सब री प्रवृत्ति दुःख मिटावा में है, दुःख रो मूल कारण वासना है, ईं ने ही क्यूं नी मिटावणी। जतरा दुःख है, वाँरी तलाश करवा शूं वासना ही मूल लाधेगा। वासना, इच्छा, तृष्णा, मनोरथ ेक ही है-
"काम एष क्रोध एष" -श्री गीताजी।
और सूवताँ, बेठताँ, देखीजाय तो वासना ही विद्यामान रे'तो मृत्यु समय वासना रहित किस तरे' व्हाँगा। ईं वास्ते कणी भी वगत चित्त में यूं नी रे'णी चावे, के यो करणो है। आप्त काम (पूर्ण-मनोरथ) रे'णो, न जाणए कणी वगत मृत्यु व्हे' जाय।
(97)
श्रद्धा।
ज्यूं आपाँ रुपियो आछोे जाणाँ, वीं ने ही शराफ खोटो के'ने खोटो जाण जावाँ पेर वीं में वो खोटा पणो नी दीखे तो भी निश्चय मे वो वश्यो ही है, सो वो वश्यो ही है, श्रद्धा खोटो दीखे। यूं ही संसार रा परीक्षकाँ, ईंने खोटो कियो सो मान्य है-
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तात्वदर्शिभिः। -श्री गीताजी
(98)
निष्काम करषा री नांई सबकरे, धान री आशा ईश्वराधीन समझणी। धान री कामना नी करणी।
(99)
सांख्य सार परम विचार।
प्रश्न-मोक्ष कई वस्तु है, ने कीं रो व्हे' ? ईं रो विचार ही मुखय् है। अहंकार ही बन्धन है, वो अहंकार कश्यो है ? श्री जनक महाराज आदि जदी के'वे के मैं हूँतो वांरो बन्धन क्यूं नी व्हियो ?
उत्तर-वो अहंकार है, ने व्यवहार भी है, परन्तु बन्ध यो ही है, के अश्यो हीज म्हूं हूं। विचारमी चावे के यो अमुक म्हूँ हूं सो कमी पे लक्ष्य करने के है। यदि शररी ही म्हूँ तो मृद्यु बाद भी शरीर रे है ? प्राण रो आवागमन ही म्हूँ तो प्राण तो वायु है, ने वींरे रेवा' पे भी मूर्छा वा, दवा शूं घावा पे अहं नो दीखे। ईं शूं सारा ही मिलने। अहं तो सारा ही सारी ही जगाने मिल्या थका है, भंगी में भी, ब्राह्मण में भी। ईं शूं इच्छा क्रोध आदि प्राकृतसर्ग समान ने सब वाताँ समान व्हेवा शूं एक ही म्हूं क्यूं ? ईश्वर री माया ही परम पुस्तक नेउपदेष्टा माता है।

ईं संसार ही रोविचार राखे, तो मुक्ति व्हे'जाय। कोईपिता पेप्रेम करे। कोई द्वेष, कोई धर्म, कोई अधर्म, सो फेर एक ही म्हूं क्यूँ। ईंने यूं समझ ले'णोे।, चावे अहं याने म्हूं, संसार में आयो पर या विचारी के अबे म्हूं कई वणूँ। तो दुःख सुख सर्वत्र और प्राकृत नियम सर्वत्र समान देख, वणी अहं कणी भी शरीर वा व्यक्ति, रो आश्रय नी लीधो। क्यूंके वीं ने वीं रे बैठवारी जगा ही नी मिली सो नाश व्हे' गयो।
नी जड़ रो मोक्ष व्हे' ने नी चैतन्य री बन्धन, अबे यूं के'वे के म्हारा जी विचार मन में है, वी दूसरा के नी है, ईं शूं म्हूं हूं तो आप विचार सिवाय न्यारा कई हो ? और न्यारो साक्षी तो एक ही है और जदी वो भी या ही के'वे के म्हारा विचार ईं रा मन में नी है, तो वा आप क्यूं नी व्हियो ? रोग में दुःख, विषय में आनन्द आदि नियम मित वात है। ईश्वर री नियमित वात से ज्ञान ही मोक्ष ने ज्ञान है।
(100)
अहंकार वा वासना हीन ने वा ज्ञानी ने कई दुःख नी व्हे' दीखो भले ही।
(101)
पञ्च कोष आत्म पुराण शूं।
आनन्द रूपी ईश्वर, वणारे नखे ही प्रज्ञान रूपी ज्ञान है। ईंरे वास्ते बुद्धि विज्ञान, ईंरे वास्ते मन संक्लप विकल्प ईंरे वास्ते प्राण, ईंरे वास्ते अन्न, वा एक एक विना व्यर्थ सब ईश्वर विना व्यर्थ।
(102)
काल शूं संसार, संसार शूं काल दोई माया शूं ने माया ईश्वर शूं।
(103)
ऊर्ध्वमूलमधःशाखः - गीताजी
उत्तानपाद, सुरुचि संसार में उत्तम विषय, सुनीति विद्या, ध्रुव-निश्चय शूँ ईश्वर मिले।
(104)
ऐसो रूप अनूप निहारो,
तेसेहि शीश चन्द्रिका, झलकनि,
ते सौ ही श्री मुख उजियारो,
श्री वृषभानलाडिली जू पै कोटिन चन्द्र निछावरि डारो।
--विनय
जननी जनम देहु तो दीजो,
पे या जुगल माधुरी ते मन छिनहुं विलग जिन कीजो।
लखि अवगुन अनन्त अपने के अम्ब क्षमा सब कीजो।।
--योगवृत्ति
पिंया सो रुठ जली पनिहारी,
औरन के घट ढूंढत डोले अपने घट हि विसारी।
सुधासिन्धु निज निकट त्यागि के फिरे तृषा की मारी।।
कोटि उपाय करे सखियन पे फिर के नांहि निहारी।
गुरु की लाज भाजं घर बैठी बाहिर फिरन सिधारी।।
मान छांडि मिलगई नाथ (पिया), सो तब पायो सुख भारी।।
(105)
बुद्धि शूंपरे ईश्वर है, तो संसार में सर्वत्र बुद्धि शूँ कार्य व्हे, ने बुद्धि रो प्रेरक है ईश्वर।
सब की मति को सर्वदा, प्रेरक श्रीभगवान।
--श्री नागरीदासजी..
तो जो निश्चय व्हे' वींरे लारे रोलारे, ईश्वर रो भी निश्चय करणो। जीं री खीचड़ी ने जींरे डोड चांवल नी करणो।
(106)
संसार या चित्त मण्डन है ? --आत्म पुराण
(107)
वासना व्हे' वीं में ही नाम री भावना करे, वा वासना में नाम स्मरण करवा लाग जाय। वासना शूँ ही अनेक संकल्प विकल्प व्है' है, सो नाम री ही ज वासना राखणी स्वतः स्मरण व्हे'गा।
(108)
नाम सब शूँ ऊँचो है, जो विचार व्हे' वीं ने नीचे राख नाम ने वीं पे स्मरण करणो. वा नाम ने विना भूल्यां विचार पड्यो, वो या भावना राखणी सो नाम ही रे' जावेगा। वासना विचार, कुल गौण, ने नाममुख्य जाणणो बस, पछे नाम नी छूटे। निष्काम कर्म, (कामना युक्त काम नी) करणो, सो ईं रो अगर तीन दिन भी यूँ रे' तो ब्रह्म-साक्षात्कार व्हे' जाय तीन तो लिख्या है पर तुरंत ही व्हे' जाय। ईं रो अभ्यास यूँ व्हे' के कामना नी करणी। ईं में नित्य जो है, संध्यादि वी नी करां योविचार व्हे' तो यूँ विचार करमओ, नी करां वा भी कामना है, करां या भी कामना है. बस, अब प्रवाह पतित ही व्हियो। पर यूँ भी नी विचारणो, के प्रावत पतित करां वा नी करां काम गीता, भारत आश्वमधिक पर्व में है। वीं में काम कियो के तपादिक में भी म्हूँ रेऊँ हूँ। ईं वास्ते म्हारो नाश नी है, ने जो म्हारो नाश करमओ चावे, तो म्हूँ हंशूँ, ने नाचूं हूँ। क्यूंके कामरो नाश करणो है, यूं विचार सो भी काम रो वृद्धि करणो ही व्हियो, यो ही सन्यास, त्याग वा समाधि है। गीताजी रो सार भी यो ही है। यो अभ्यास शूं शीघ्र वा कठिनता शूं व्हे' शके है।

(109)
ब्रह्म में स्थिति।
'म्हूँ बालक व्हूँ', 'म्हूँ' ही जवान व्हूँ। 'म्हूँ' ही सुखी व्हूँ'। म्हूँ ही दुःखी व्हूं। म्हूं ही मूर्ख हूँ। म्हूं ही विद्वान व्हूं। म्हूं ही जनमूँ। म्हूं ही मरूं। म्हूँ ही रोगी, म्हूँ ही आरोग्य, मतलब जदी के ेक ही म्हारो' (म्हूं अणीरो) निश्चय नीहै, तो यो निश्चय सत्य क्यूंनी व्हे के म्हूं ही आत्मा हूँ। ईं निश्चय में ही सब आय गियो।
प्रश्न-आत्मा तो दीखे नी, ईं शूं वीं रो निश्चय नी व्हे' शके ?
उत्तर-दीखे तो कई भी नी है, सिवाय आत्मा रे, परन्तु सतगुरु आज्ञानुसार सादन शूं दीखे है। पर यूं भी के'णो है, वास्तव में तो देखे है, पर अज्ञान शूं दीखे है।
प्रश्न-आत्मा कश्यो है ?
उत्तर-के'वा शूं समझ में नी आवे, पर शून्य नी है, सच्चिदानन्द है।
प्रश्न-कतरा दिनां में आत्मज्ञान व्हे' शके?
उत्तर-ईं रो निमय नी है, पर जतरी सतगुरु रा वाक्य पे श्रद्धा व्हेगा, वतरी ही जल्दी आत्म प्राप्ति व्हेगा।
प्रश्न-सत्गुरु री कई लक्षण है ?
उत्तर-साँचो गुरु (अणीरे सिवाय) शास्त्राँ में और भी लक्षण है।
प्रश्न-साधन (कश्यो है) ?
उत्तर-अनेक है, जश्यो गुरु बतावे सो ही मुख्य है।
प्रश्न-तथापि कोई उत्तम साधन वतावणओ चावे ?
उत्तर-जो गुरु अधिकारी देख, ने वतावे सो ही उत्तम है। परन्तु सब अधिकारियाँ रे नाम समान, साधन और नी है। संसार शूँ मन में वैराग्य राख जपणो चावे। पे'ली भी लिख्यो हो। ईं में दूसरा ने आगे री भूमिका पूछवा रो भी जरूरत नी, वो ही ईश्वर वीं रो गुरु है।
(110)
दूणो दुःख नी उठावणो।
कर्माधीन व्हाँ ज्यूं दुःख व्हे'। वीं शूं घबरावा शूं वो बढ़जाय। उद्योग करणोे, पण इच्छा नी करणी। कर्त्तव्य जाण ने करणो।
(111)
ईं में घणा खरा विचार उन्नत भूमिका रा है। वाँ रे अनुसार कोई अधर्म नी करमओ चावे, धर्म करमओ, क्यूंके जदी समता है, तो शास्त्र प्रमाण ही करणो।
(112)
कृष्ण चरित जी चहत है, आंखिन देख्यो मित्र
जहँ लगि मन बुद्धि सकल, कृष्ण चरित्र विचित्र।।1।।
--सकल जगत को जानिये।।
(113)
प्रश्न-जगत सत्य है वा असत्य ?
उत्तर-सत्य रे मूँडा आगे असत्य, ने असत्य रे मूँडा आगे सत्य है।
प्रश्न-कोईक असत्य के'वे दूज्यूँ सब ही सत्य के' है।
उत्तर-जी सत्य के' हैं, वी भी जगत में है, तो परीक्ष्य है, परीक्षक नी है। परीक्षक के' सो ही वाताँ साँची है। शराफ शेंकड़ाँ रुपया परखे, पर शराफ तो सत्य ही है। एक सराफ अनेक रुपया। एक चतेन अनेक जड़़ चेतन री वात साँचीं, जड़ री झूठी।
(114)
भक्ति ने ज्ञान में कई अन्तर है ?
एक कीड़ी जाय री' ही। वणी ने रोकवारी कणी आदमी विचार कीधो सो वींरे (आड़ो) हाथ राख्यो। फेर वा वठी शूँ फिर ओर आड़ी लावा लागी। जदी दूसरा हाथ शूँ फेर वठी भी रोक दीधी। वणीज आदमी रा दोई हाथ है। आदमी=ईश्वर, कीड़ी=माया, मन=हाथ, ज्ञान-भक्ति अन्तर-वृत्ति, बाहिर वृत्ति रो अठी उठी जावणो। अन्तर वृत्ति रो अर्थ, मन में विषय चिन्तन है।

(115)
कथा श्रवण
कथा श्रवण करती वगत ध्यान करमओ, अब भी भरतजी जटा मँडल धारण कीधो, ने श्री प्रभु मिल्या। ऊँ जाणे देखी थकी वात वा शुणी वात रो ध्यान ककरणो ?
"ज्यू वीठ स्त्रियाँ री वार्ता" --श्री भागवत
(116)
देखे सकल उजास पे है न भान रो भान -गुमान बत्तीसी
आत्मा नित्य है। सूर्यनारायण रा प्रकाश शूं जदी एक आदमी दूसरे गांव जावे ौर वीं ने सूर्यरीयाद कतरीक दाण आवे, यूँ ही आत्मा रा प्राकश शूं सब है, परन्तु आत्मा ने लोग नी विचारे।
(117)
"अहं" (म्हूँ) ने 'इदं' (यो) करलो 'इद्रं' 'अहं' इदं कर्म करोमीति।

(118)
अहं है, सो अहं (अ+हम्-म्हूंनी) अहं रो अर्थ है म्हूं नी, (अठे) नञ् समास है। हंस रो अर्थ व्हे' म्हूं वा मेरो अर्थ में (माँयने) है'। माँय जो बोले है, सो यूं के है' के वो ईं' रे माँयने है। माँयने वोहीज बोलावे है। आई लाँय ने लारे री लारे अविद्या आई।
(119)
नाम स्मरण मन में करणो, सो जोर शोर शूं करता व्हाँ ज्यूं करणो, वा पे'ली थोडी देर जोर शूं कर, पछे जो उच्चारम रो शब्ब हियो, वीरो ध्यान बरोबर करणो। फेर भूल जाँवां तो जोर शूं के' लेणो। जतरा संसारीविचार व्हे' है, वी भी देखाँ तो जाणे जोर शूं के'ताँ व्हाँ' ज्यूं मन में व्हे' है। घणा खरा मन राविचार बोल भी जाय। ज्यूं प्रकट वा स्वप्न में। श्री गजराज रे तिल प्रमाण सूंड बारणे रहि, जदी हरि नाम पुकारयो, सो मन में ही प्रकट री नाईं हेलो पाड्यो, हे नाथ ! वा अजामिल भी यूं ही पुकार्यो व्हेगा।
मरती समय नाम पर रुचि घटे तो ईंरा (नाम रा) महात्म्य री पुस्तकां देखणी। सीताराम, नाम-प्रताम प्रकाश वा भगवन्नाम महात्म्य वा सर्वत्र ही राम चरित्र रामचरण दासजी कृत, नाम महात्म्य आदि है। या तो प्रायः सर्वत्र आवे है, प्रवणो धमुः इत्यादि कलिसन्तारणओपनिषद्।
ईशा नाम पराध छोडणा वांरा नाम शूं नारजगी (तो छापो छिक्का पे आप देश प्रियक्यूं नी वो के वो...।)
(120)
हिया री होटां आवे पण हिया में नाम राखणो, जो वोह ही आवे अन्ते मतिः सा गतिः शूं हिया री परलोक में भी आवे ज्यूं सन्निपात मंे अनुभवी थकी वीती थकी ही वात करे ौर नी, या ही हियारी है अन्तर्निविष्ट बस।

(121)
पाणी ऊनो करे सो कठे जाय ? बन्द करदे' तो भी। अविद्या अनित्य, ने नित्य मानणी। ईंशूं जाणी जाय के नित्य अगरकई नी व्हे' तो नित्य री भावना ही क्यूं व्हे'ती, परन्तु कोई नित्य वस्तु अणी रे नखे ही है, सो मृगनाभी री नाईं या वींने भूल ओरां में लीन है।
प्रश्न-अगर यो शरीर नित्य व्हे' तो ?
उत्तर-यो शरीर तो प्रत्यक्ष नाशवान है। (मनख) मृत्यु पाय भी ईं ने नित्य माने है। अगर ईं ने नित्य नी मानता तो अनर्थ क्यूं करता।
प्रश्न-शरीर अनित्य व्हे' तो कई,पञ्चभूत तो नित्य है ?
उत्तर-वर्तमान समय में तो स्वप्न भी नित्य है ही ने पञ्चभूत भी नित्य नी है। क्यूंके कालकृत व्हेवा शूं परमाणु नित्य है। यूं मानो सो केवल कल्पना है। ईं वच्चे तो नित्य ने नित्य जामणो ठीक है, ने काल मन कृत, यूं परम्परा शूं नित्य ेक ही है। यूं ही सब समझ ले'णा अशुचि आदि।
(122)
अथवा अनित्य है शुचिताआदि शरीर में पण, अशुचिता ही नित्य है, ने आत्मा में अशुचिता आदि अनित्य है, पण शुचिताआदि ही नित्य है। योग सूत्र में अनित्या शुचि सिद्धि शूत्र देखो।
(123)
ज्यूं कोई केवे, म्हांणे अठे तो आकाश आदि है तो हंसी री वात है। यूं ही के'णो म्हूँ सुखी हूँ, दुःखी हूँ आदि। ईं तो सर्वत्र है, एक में ही क्यूँ ?
(124)
अगर म्हूँ करूँ तो आंखाँ शूं शुणणो वगेरा विपरीत क्यूंनी करूँ। ईं शूं ई प्राकृत है। प्रकृति शऊं अणीतरे रा ही वण्या थका है। अहंकार सहित, सांख्य, ईं शूँ ही सुगम मान्यो है, शान्ति पर्व में भीष्मजी।
(125)
अहं री उत्पत्ति।
जश्याजश्या कर्म अनादि अविद्या शूं व्हिया, वश्या वश्या ंसस्कार जीव पे पड़ गया, सो ही 'अहं' है। वीं ने वीं ज माफिक शरीर मिल गयो। याने, स्वतः वश्यो ही शरीर वणी आपणो मान लीधो। ज्यूँ कणी चोरी करने आपने चोर मान लीधो, सो यूँ विचार राखणो के कर्मानुसार अहं वण्यो है सो ईं न्यावटा शूँ कई मतलब ? जश्या करे वश्या ही भरे। ईं रा हिसाब में कुम पच मरे। दूज्यूँ 'अहं' तो विचार मात्र है, ज्यूँ अतरा विचार ज्यूँ हीज अहं है। पण ईश्वर री माया है, के ेक विचार जीव व्हे' जाय।
(127)
चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निर्वापणं,
श्रेयः कैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्‌।
आनन्दाबुद्धिवर्द्धनं प्रतिपद पूणमृतिास्वादम्‌ं,
सर्वात्मस्नएने परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्‌।।
(भावार्थ-जो कृष्ण भगवान् री भजन चित्तरूपी काच नेसाफ करवावालो है, संसाररूपी लाय ने बुझावावालो है, जीवाँ ने खूब शांति देवावालो है, विद्यारूपी स्त्री री जीवन है, आनंदरूपी समुद्र ने वधावावालो है, पग-पग में अमृत ने पावावालो है, और जो बहुत ही शीतल है, वो हीज संसार में सब शूं उत्तम है।
नाम्नाकारी बहुधा निज सर्व शक्ति-
स्तवार्पितो नियमितस्मरणे कालः।
एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि
दुर्दुवमीदृशमिहाजनि नानुरागः।
(भावार्थ- हे भगवान् ! आपरी तो पूरी दया है ही, परन्तु आपरा नाम स्मरण में खुद री सब शक्ति लगाय देवा पर भी आप में अनुराग नी उत्पन्न व्हियो अर्थात् आपरा चरणारविंदां में शक्ति नी व्ही'। यो म्हारो दुर्भाग्या है।)
तृणादपि सुनीचेन तरोतपि सहिष्णुमा।
अमानिया मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः।।
(भावार्थ- वारा रा तिनका शूं पण (अधिक) नीचो, वृक्ष शूं पण (अधिक) सहन शील, मान अर्थात् अहङ्कार रहित और दूजां ने मान अर्थात् आदर देवावालो व्हे' ने सद सर्वदा भगवान् रो भजन करणो।)
न थनं न जनं न सुन्दरी,
कवितां वा जगदीश कामये।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे,
भगताद्भक्तिरहेतुकी त्वयि।।
(भावार्थ-हे भगवान्, नी तो म्हूँ धन चाऊँ नो कुटुम्ब, ने नी जो सुन्दर कविता। केवल, जन्म-जन्म में परमात्मा मेंलोभ रहित भक्ति हो' याहि ज म्हूँ चाऊँ हूं।)
अयि नम्दतनूजकिङ्करं,
पतितं मांविधमे, भवाम्बुधो
कृपया निजपादषङ्कज-
स्थितधूलीसदृशस्भावया ?।।
(भावार्थ-हे नन्दकुमार, म्हूँ आपरो सेवक हूँ सो अपार संसार-सागर में पडया थका म्हने आप आपरी चरण-रज शूँ बचाय लेबे ?)
नयन गलदश्रधारया,
बदनं गग्दरुद्धया गिरा।
पुनर्कनिचितं कदा वपु-
स्तव नाम ग्रहणे भविष्यति।।
(भावार्थ-हे भगवान्, आपरो नामस्मरण करवारे समय आंसुवांरी धारा शूं युक्त आंखाँ, गद्गदकंठ वालो मुख और रोमांचावोल शरीर कणी दिन व्हे'गा ?)
युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावुषायितम्‌।
शून्यायितं जगत्सवं गोविन्दविरहेण मे।।
(भावार्थ-भगवान् रा वियोग शूं, क्षण, युगाँ रे समान व्हेवा लागो, आँखां चौमासा रा बादला वण गई' और जगत् सूनो व्हे' गयो।)
आश्लिष्य वा पादरमातमनुष्टुवा-
मदर्शननान्मर्महतां करीतु वा।
यथा तथा व विदधातु लंपट,
मत्प्राणनाथस्तु स एवं नापरः।।
(भावार्थ-गोपी प्रार्थना करे, के हे भगवान्, म्हने भावे तो कंठ मे लगाय ने चरणाँ में शरण देवे, भावे दर्शन नी देय ने दुःखी करे-मार न्हाके, भले ही आपरी इच्छा व्हे' सो करे परन्तु म्हारे प्राणप्यारा आप हीज ही दूजा नी।)
बस, ईं में सम्पूर्ण परमार्त विाचर आय गयो। ईं सिवाय कई भी नी है।
(128)
अगर संसार रो ही कियो प्रमाण है, तो सब संसार थने थूँ केवे, पर म्हूँकोई नी केवे। जदी म्हूं किस तरे व्हियो ? ईं शूं सब थूँ है याने (मध्यम) पुरुष है। उत्तम पुरुष तो ेक ही है। ईं रो यो मतलब के जो दीखे है, सब थूं है, म्हूं नी है। किन्तु म्हूं तो एक ही ज दीखे है। थूं नराई, म्हूं एक अहो स्वयं प्रकट व्हेवे।
प्रश्न-सब तरे' शूं वींने अविद्या किस तरे दबावे ?
उत्तर-जड़ भरतजी वत् वीरो वी के'णों फलाणो वात म्हूं करूं, तो ठीक वठे यूं विचारणओ थूं करे तो ठीक कोई ककठिन काम आय पड़े, वठे मनख यूं के' फलाणो काम म्हाँ शं नी व्हे' तो पण पछे म्हें कियो, थारे अबे कई करणओ है ? ने फलाणा, अबे के जो थूं चूक जायगा तो फेर अश्यो अवसर नी मिलेगा। यूं ही सब काम विचारणा अहन्ता नी आवा देणी।
।।अथ नामापराध पद्ये।।
(129)
श्री राधाचरण गोस्वामीजी लिखित
सतां निन्दा नाम्नः परममपराधं वितनुते,
यतः ख्याति यातः कथमु सहते तद्वि गरहाम्‌।
शिवस्य श्री विष्णोर्यइह गुण नामादि सकलम्
धिया भिन्नं पश्येत् स-खलु हरिनामाहितकरः।।
गुरो रवज्ञा श्रुतिशास्त्रनिन्दननम्,
तथार्थवादो हरिनाम्नि कल्पनम्‌।।
नाम्नो बलाध्यस्यहि पापबुद्धि,
र्न विद्यते तस्य यमै हिं शुद्धिः।।

धर्मव्रत त्यागहुतादि सर्व,
शुभक्रिया साम्य मपि प्रमादः।।
अशुद्धचित्तेन
श्रुते (हिं) नाम माहात्म्ये यः प्रीतिरहितो नरः।
अहं ममादिपरमो नाम्नि सोम्यराधकृत्‌।।
जाते नामापराधेपि प्रमादेन कथंचन।।
सदा संकीर्तयन्नाम तदेकशरणो भव।।
(130)
अगर यूं विचार करां के दुःख व्हे' जीं शूं हाल म्हारो मोक्ष नी व्हियो, सो कई, दुःख म्नहे ही ज व्हे' है, यूं ही सब।

(131)
सुखं दुःख समं कृत्य-
यूं विचारणओ के ई दो ही चित्त री वृत्तियां है। यूं ही सब ही वृत्तियां ने समान ही मानणी। क्यूं के वृत्तिपणो तो समान ही है और ओछी वत्ती भी नी व्हे' शके, अप्रत्यक्ष व्हेवा शूं, सो देश कालादि परिच्छेद भी यां में नी व्हे' शके, तो एक ही वात व्ही' माया एक, ईश्वर एक, बस, आकाशवत्‌। आकाश में तो घटादि उपाधि पण है, पर वृत्ति में तो सो भी नी।
(132)
सब एक है, पण म्हूं दूजो नी व्हेऊं। ज्यूं स्वप्न में एक मनख म्हारे पे प्रहार कर रियो है, सो वीं में, ने म्हारे में फर्क नी। क्‌ूयं के दोई कल्पित है, परन्तु ेक में अहं कर्मानुसार व्हे' गयो। यूं ही मनख जश्या जश्या कर्म करे वश्या वश्या ही अहं वण जाय है। अहं केवल कर्म रो समूह है, सो स्वप्न वत् है, ज्ञान शूं नाश व्हे'।
(133)
राजकुमार वत्‌।
सब ही मनो मन बन्धन समझ गया, ने राजा ने पकड़ाय दियो। भाव-राजा=जीव अहंकार शूं बन्ध्यो है तो अहंकार तो सर्वत्त है, फेर बन्धन कई ? परएक दूसरा ने पूछ ेजदी तो राजा ने छुड़ाय लें। यूं हीएक दूसरा रो विचार करे, जदी तो निश्चय व्हेट जाय, के आपां तो सारा ही एक ही समान मनो मन बन्ध मान्यो है, याने पृथक दीखां हां। या वात यूं है।
कणी राजा आपणां पुत्र ने नाराज व्हे' ने वीं री माता सहित निकाल दीधो। वो पुत्र बड़ो व्हियो, जदी वीं री मां कियो, थारा बाप ने बांध लाव, तो कुंवर सभा में जाय राजा ने एक शींदरा शूं बांधवा लागो ने यूं कियो केेक आदमी म्हारा शूं नी मिल्यो है, दूज्यूं सब म्हारे शामिल है। तो सारा ही मनो मन समझया। नीं मिल्यो तो तो म्हूं नी हूँ, सो अतरा शूं कित तरे लड़ूं। यूं मनो मन डर गया ने राजा बन्ध गयो, ने वीं राणी रे पगां में राजा ने पटक दीधो। राणी=माया, कुमार=मन, राजा=जीव, सभा=प्रकृति, या ने, स्वभाववा अहङ्कार पुरुष परीक्षा में या वात है।

(134)
कोई आदमी जब प्रकृति रो वर्णन करे, तो मन बड़ो ही प्रसन्न व्हे' और फेर वीं ने शुणवा रो विचार व्हे' वात चावे जशी हो व्हे' यो ही काव्य में काव्यत्व मान्यो है, ने ईं शूं ही मीठी दवा शूं रोग मिटवा री उपमा दीधी है, ज्यूं हीज या वात।
अथवा कणी वात कीधी थाली पे रींगटी खेचवा शूं रुं रुं ऊबा व्हे' जाय, या नाहर रो वर्णन वगेरा वा विवाह रो वर्णन रघुवंश में, वीं सूं चित्त ने प्रसन्नता क्यूं व्हे। साहब शकुन्तला रो श्लोक वाँच, क्यूं नाच्यो। मतलब-वठे एकत्व प्राप्त व्हे' है। प्रकृति रा वर्णन शूं याने प्रथक्ता लोप व्हे' है। यो ही सांख्य रो मोक्ष है, ने काव्य रूपी मोक्, यूं ही सहज में व्हे' है। विचार वारी वात है।
(135)
ओ सुख चाहे सतत मन, दुख ते कछूक डरान।
छांडि विषय विष अवसि कर, अमिय ईश यश मान।।

(136)
स्वप्न साक्षी जागृत साक्षी, सुशुप्ति साक्षी एक ही है।
(137)
तृष्णा दुःख लावे, अहंकार उठावे ऊंचावे, धारण करे।
(138)
पाठी ऊमर पीठ दे, न्हाठी सों भवधार।
काठी कर में पकड़ ने, लाठी लीधी लार।।
--स्वरचित
अर्थ-लाठी यूँ पकड़ी है के ऊमर चली गई, ज्यूं या भी नी भगा जाय, परन्तु या तो स्ममशान तक साथ देगा, वा वीं युवा ऊमर ने सजा देवा री इच्छा शूुँ लाठी दीधी है। भाव-पाछी युवावस्था री च्छिा नी करणी सो भय मृत्यु भयधार ने जवानी भागी यो दूजी अर्थव्हे।
(139)
माया केवल पत्तो लिख्यो पत्र है।
ज्यूं डाक में शूं आपमा नाम रो लिफाफो आयो, पण माँय. ने कई नी। यूँ ही ऊपरे सरस, पर परिणाम कुछ नी, खोल देणो सो कुछ नी।
(140)
शरीर कर्म शूँ वण्यो, ने ईं ने देखवा शूं कर्म बन्धन व्हे' ने यो ईश्वर रूपी खाँड रो मेल, मन बालक ने दीधो, जो ईं ने काम में लावे वीं ने और कई नी मिले ने घमां बालकाँ री माँ ज्यूंँ यो शरीर गारा रो खेलकण्यो है, ईं शूँ नी खेले वणी शूँ माता प्रसन्न व्हे'।
(141)
दृढ़ता शूँ छोड़ दो केवल मन शूँ।
(142)
बुद्धि।
निश्चय शूं ही संसार व्हियो, ने निस्चय शूं ही नाश व्हे'। या निश्चय कीधी, यो म्हूं, यो यो। मेसमेरिजम भी निश्चय शूं तलाव देखावे। बस, यो मन निश्चय ही ईश्वर वणायो और कुछ नी वणायो।
(143)
जींरे आश्रय है वो सत्य है, जीं सूँ या वात सत्य है, यो भी तो विचार है, ने नी दीखे, या ्‌सत्य है, वो भी विचार है। नी दीखे तो वी दोई समान ही व्हिया। यूँ ही द्वन्द दोई असत्य व्हिया। जीं शूँ सत्यासत्य सिद्ध व्हे' सो ही सत्य श्री कृष्ण चन्द्र है।
(144)
रतनारे (बोखारे) दाँत काड़वा री ना है। माया री सत्यता भासे तो भी असत्य है। व्यवहार भल ही व्हो' परमार्थ में झूठ है।
(145)
श्री भक्त शिरोमणी मींरा माता रो यो वचन याद राखमओ चावे, के पुरुष तो एक ही श्री कृष्णचन्द्र है, और कुल स्त्री (प्रकृति) है, ईं में बड़ी सहज मुक्ति है, केवल स्त्री भाव राखणो।
(146)
"एकोऽहं बहुस्याम्‌। श्रुतिः।"
एक ही म्हूं बहुत प्रकार रो व्हूँ। एक ही जो 'अहं सो बहुत तरे' रो व्हियो ज्यूँ अहं सुखी दुखी आदि सब व्यवहार में यो ही ध्यान राखमओ, के एक ही अहं है। है भी यूँ ही बिलकुल फरक नी है।

(147)
ईश्वर री याद यूँ राखणी ज्यूं मुसाफिर ने रेल री याद रे'। दो आदमी एक जगा' सुता। एक एक हेलो दोयाँ ने ही पाड्‌यो। एक झट जाग गयो, एक नींद कारण, वींरा मन में यद्यपि नींद में हो पर याद रेल री, यूँही समाधिस्थ पुरुष भी पाछो उलपझ जाय, पर दूजा रे रेल में बेठवा री नी ही, वो संसार ने असत्य जाय तो हो, सो नी जाग्यो। थोड़ी भीसंसार री सत्यता महा महोने देखावे है।
(148)
तीरथ राजा प्रयाग जहँ, तिरवेणी की तरी।
तहाँ बिन्दुमाधव निरखि, सहज हि शुद्ध शरीर।।
(149)
षट् चक्र में वा मातृ का वर्ण रा ध्यान शूं शब्द ब्रसलह्म रो ज्ञान व्हे' है। मतलब-सब ही वर्ण अक्षरात्मक है, वैखरी मध्यमा ादि सब ही व्हिया है।
(150)
अहं (म्हूँ) इत्यिदि म्हूँ कई सत्य है ? ज्यूं स्वर, व्यंजन में है, यूं ईश्वर जगत मे ंहै। जगत ईश्वर विना नी, ई्‌सवर जगत विना भी है, ने ईश्वर विनाजगत है ही नी।
वचन अतीता होय के, भव की भीता खोय।
गीता जननी गोद मे,ं रहो नचीता सोय।।

चोथोभाग

(1)
'असक्तो ह्गचरन् कमं'
श्रीगीताजी
असक्य यूं व्हे' शके है चो विचार चित्त में व्हेवे वा करे सब ने यूं समझे, ई तो व्हियां ही करे है, ने अनेक वार व्हिया है, भुक्तयोग है, अनुच्छिष्ट नी है, पे'ली पण अनेक दाण काम में अनेकां रे आया थका है, नईचीज कुछ भी नी है, योविचार हरेक समय राखवा शूं असक्त व्हे' जायगा।
(2)
प्रश्न-भक्ति, ने ज्ञान में कई अन्तर है ?
उत्तर-भक्ति, अनुलोम विचार है, ईश्वर ने विचार कर प्रपंच ने विचारणो। ज्ञान प्रतिलोम है, प्रपंच ने विचार ईश्वर ने विचारमओ। सब ईश्वर री माया है। म्हूं कुछ नी हूं और यो विचार पण ईश्वर री माया है। जो ईश्वर री इच्छा व्हेवे सो ही व्हेवे या भक्ति है। सब झूठ है, यो ज्ञान है।
(3)
या माया बड़ी वृद्धा है, तो पण नित नवी दीखे है। वृद्ध पुरुषां रा वचन है, के जस जण हारो तो पण अकन कुंआरो। सदा रम्य ही दीखे है।
(4)
आपूर्व श्री गीताजी
ईं रो भाव यूं व्हे' है, के जणी तरे' समुद्र पूर्ण है, तो पण वीं गें अनेक नदियां रो जल आवे है-
"जिमि सरिता जलनिधि महं जाई"
--श्री मानस
यूं ही अनेक कामना पण पुरुष नखे आवे है, वीं में ज्ञानी अज्ञानी रो तो अन्तर यो बतायो है, के वीं में स्वतः ही कामना आवे है। परन्तु अज्ञानी कामना नखे जावे है। ईं शूं ज्ञानी कामना व्हेवा पे यू ंविचारे, ज्यूं समुद्र में पाणी आवा नी आवा शूं हानि लाभ नी, यूं ही आत्मा में पण कामना शूं कई हानि लाभ नी। ईं तरेट शूं वो कामना री उपेक्षा करने वांरे लारे नीलागे। जो व्हेवे सो व्हेवे ही है, ईं शूं बन्धन नी व्हेवे। परन्तु अज्ञाना सहसा कामना रे लारे लाग नष्ट व्हे जावे-
"कामानुसारी पुरुषः कामानंनु विनश्यति"
--श्री भारत
काम कामी शांति ने प्राप्त नी व्हेवे। क्यूंके वो यूं विचारे, यूं कर काढूं, यूं कर कढूं पर ज्ञानी विंचारे अब या कामना व्ही' अब या यूं व्हेवेगा। वात एक ही, विचार रो फरक है। ज्ञानी जाणे कामना है, सो बारणे ही नी है। किन्तु म्हारी ही तरग रा आकार है, और अज्ञानी जाणए काम्य वस्तु बारमए कुछ अन्य है।
(5)
आत्मा ईश्वर अत्यन्त समीप व्हेवा शूं नी दीखे ज्यूं काजल वा आंखख ही नी दीखे-
जगत जनायो जेहि सकल, सो हरि जान्यो नांहि।
ज्यों आंखिन सब देखिये, आंखि न देखी जाहि।।
--बिहारी सतसई
पढ़े लिखे में का पड्यो, अहे समुझिवो सार।
जो समुझावे सबन को, सो तूं समझ विचार।।
--चतुर चिन्तामणि
(भाव) सर्व साक्षी आत्मा है, जो या म्हूँ लिख रियो हूं ईं ने विचार सो ही आत्मा ने विचारे सो ही आत्मा, ईं ने पण विचारे सो ही आत्मा। पुष्पक विमान न्याय शूं ेक जगा' बरोबरा खाली ही है, चावे जतरा मनख बैठ जावो। यूं ही जठा तक विचारआगे करां, आत्मा आगे ही आगे रे'गा। ईं शूं ही निर्लेप ज्यूं पाणी बढ़े, कमल ऊंचो ही व्हे' तो जाय। ज्यूं लुड़क दवात ने चावे जतरी ही गुडा़वो मूँजो ऊंचो ने पींदो नीचो ही रे'गा। यूँ ही ब्रह्म निर्लेप ही रे'गा। यो विचार श्री काकाजी गुमानसिंहजी हुकम कर्यो, यो ही सर्व सिद्धान्त है। ईं वास्ते जो विचार है वींरो साक्षी आत्माहै। चावे ऊँडा शूँ ऊँडो विचार व्हे'। सूर्य नारायण वतरा ही छेटी दीखेगा चावे मे'ल पर शूं देको, चावे मंगरा पर शूं देखो ने चावे जमीन पर शूं वा खाड़ा शूं देखो। वठे द्वारका री नावाँवत् पाणी शूँ ऊँची'ज रेवे-
"जाणे सोही आतमा, जावे सो मन जाण"
--श्री गुमानसिहंजी
(6)
एक दविस मरि है अवस स्ववस कि परवस होय।
कैसे फस आशा विवस, दियो मनुष तन खोय।।
आशमान क्यूँ व्हे' रह्‌ोय, नाशमान जग जान।
प्यास हा नहिं होत जहें, भासमान जल भान।।
--स्वकृत।
मांयने संसार असत्य जाणो, पण बारणे सत्य-स्वप्नवत् (जाणो)
(7)
वासना रहित व्हेवा शूं मुक्ति व्हेवे।
प्रश्न-वासना विना व्यवहार किस तरे' करे ?
उत्तर-वासना रहि व्हे'ने व्यवहार करे।
प्रश्न-व्यवहार ठिक नी व्हेगा। क्यूं के याद नी राखवा शूं भूल जायगा ?
उत्तर-व्यवहार करमओ है या परमारथ। परमारथ में संसार ने मिथ्या जाणणो पड़े तो मिथ्य वस्तु रो कई विचार, जठी चालमो वठी देखमओ। ईं शूं ही श्री शङ्कर स्वामी आज्ञा करी है, के कर्म ज्ञान शामिल नी व्हेवे वींरी आड़ी शूं तो व्यवहार मित्या है, तो वासना किस तरें व्हेवे। नामदेवजी मरवा लागाने मृत्या रो निश्चय कर लीधो, जदी परमेश्वर दर्शन दीधा. यूं ही ईं शूं बिलकुल मूंडो फेरे लेवे जदी परमारथ व्हेवे। परन्तु वींरो व्यवहार नी विगड़े। क्यूंके 'योग क्षेमं वहाम्यहन्' श्री गीताजी में आज्ञा है। पण यूंविचार राखे फलाणी वात विगड़ नी जाय। जतरे वींरे निश्चय में संसार सत्य है, ने परमारथ नी सधे।

(8)
बाईशिकल चलावती वगत विचार हात में राखनो ने व्यवहार करती वगत मन में।
(9)
एक महात्मा रा शिष्य शान्त स्वभाव वाला हा, वांरो श्याम रंग देख लोग निन्द कराव लागा, ने दुखी करवा लागा. जदी वणां गुरु नखे जाय ने कही के ईश्वर री सृष्टि में पण कश्या लोग है, व्यर्थ ही दूसरां री निन्दा करे। गुरु कही थूं पण वस्‌ोय ही है। ज्यूं तारों रंग ईश्वर कृत है, यूं ही वांरो स्वाभवा पण ईश्वर कृत है।
(भाव) महात्मा ने चावे के अतरी पण दूसरां रो वात मन में नी लावे।
(10)
जो चित्त फूंक सूं (मूंडा री हवा शूं) उड़ जाय, वो कई ठे'रे अर्थात् मनुष्यां री वात शुण चलित व्हे' जाय, वो कई भजन वा कार्य कर शके।
(11)
एक ादमी रुई री महीन तन्तु रो पञ्जर बणाय हवा ने अग्नि शूं वचावा री कोशिस कीधो अग्नि शूँ वो भस्म व्हे' गयो। दूसरे पण यूँ ही, ही सब काल अरिन दिन तूल ?
(12)
"कबरी तेरी झोपड़ी, गल कटियन के पात।
जो करि हैं सोई पाइये, तूँ क्यों होत उदास।।"
गल कटिया चित्तवृत्ति, माया प्रकृति, तू आत्मा अहङ्कार भुगते मन रा मन, बुद्धि रा बुद्धि, शरीर रा शरीर, इन्द्रियाँ रा इन्द्रियाँ, तो ईं में थूं उदास क्यूँ व्हे' है। भाव थूँ याँ शूँ अलग हैष।
(13)
सत शात्र सतगुरु तिन्हे, समझावे किहि भाँत।
मरिवेकी मानन न जे, मरिवे यू पे वात।।1।।
स्वकृत।
ज्ञानी पक्ष में-वो आपने सच्चिदानन्द जाणे है। ईं शूँ सन्त आदि वीं ने उपदिष्टोपदेश (उपदेश मिल्यो थको उपदेश) किस तरे' करे। वाँ रो शरीर छूटजाय, तो पण वोआपरी मरवो नी मानेगा।
अज्ञानी पक्ष में-मरवो जाण्या विना वैराग नी व्हेवे, वैराग विना ज्ञानादि पुरमार्त रो कई साधन नी व्हेवे, तो अज्ञानी मरजावे तो पण मरवा री वात नी माने। आखरी दम तक पण संसारी वांता ही करे, ने मनन करे वा उपदेश करताँ 2 मरजावे, तो पण नी माने वा मनुष्य मर जावे है, अनेक मरया थका देखे है, तो पण जो मरवा री वात नी माने वीं ने कईउपदेश लागे। मरवा री वातं के'वा में सब ही माने, अन्तश में नी।
'स्वमस्तकसमारुढ़ां मत्यु पश्येज्जनों यदि।
आहारोऽपि न रोचेत किमुतान्यविभूतयः।।'
(14)
जो या समझ लेवे के अन्तःकरण ही में सुख दुःख है, वारणे कुछ भी नी, वींरो पण चित्तस्थिर व्हे' जावे। क्यूँ के अन्तर दृष्टि व्हेवा शूँ।
(15)
सुख में नी व्हे'णो दुख में दुखी नी व्हे'णो, सुख दुःख तो व्हे' हीज है। वीं में फेरदूजो सुख दुःख वीं सिवाय नी कलपणो।
(16)
संसार में सुकरी अपेक्षा दुःख विशेष है। क्यूँके कामना पूर्ण व्हेवाा में सुख ने, नी व्हेवा में दुःख व्हेवे, सो अनेक कामनुा हर समय व्हे' तो रेवे, वीं में शूँ एक आधी पूर्ण व्हेवे है।

(17)
आपणी वृत्याँ ने देखात रे'णो के दुख रा बीज आपां हीज वावाँ हाँ, ने जो कामना पूर्ण व्हेवे वणी में भीकामना रे'वा शूँ दुखदाई हीज है।
(18)
सुख, दुःख, मान, अपमान, प्रिय, अप्रिय, आदि द्वन्द है मनोरथ रूप नदी रा दोई किनारा है। विना किनारा नदी रो अभाव है। एक किनारो रे' तो दूसार पण है, एक नी है तो दूसरो पण नी है। एक नी है, तो नदी पण नी है, नदी नी है, तो कर्त्तव्य पण नी है।
(19)
सुख दुःख शूँ आपाँ अभिन्न हाँ, तो पण सुख दुःख नी व्हे'णा, चावे, भिन्न हाँ तो पण नी व्हेणा चावे।
(20)
जी आपाँ (मनुष्य) ने सुख व्हे' है वीं में शूँ सन्तोष निकला ने देखो के सुख व्हे' है, के दुःख। वा ज्यो आपाँ (मनुष्याँ) ने दुख व्हे' है वीं में सन्तो, मिलाय दो, पछे वो दुःख व्हे' है, या सुख। भाव-सन्तोष में सुख असन्तोष में दुःख।
(21)
ज्यूं सुवर्ण में भूषण कल्पित है, यूं ही ईश्वर में संसार कल्पित है। ब्रह्म में प्रकृति, ईं में महत्तत्व अहङ्कारादि तो ज्यूं वृक्ष रा कमाड़, पेटी, खेलकण्यां, (बालकाँ रे खेलवारी चीजाँ) डाबी आदि यूं ही। क्यूँके याँ में काष्ट बरोबर है, और झूठो।
--श्री परमहंसजी महाराज
(22)
ज्यो स्वयं ही कीधो थको है, वो कर्तमा किस तरे' व्हेवे।
-श्रीभारत
(23)
आकाश में शब्द ने कान में आकाश तो शब्दादि रो जीं शूं भान व्हे' वो आत्मा।
--श्री भारते।
(24)
'आप मरयां दिना स्वर्ग नी दीखे।' लोकोक्ति। आप अहं कामना सुख रे वास्ते करे, जद छोड़वा में ही सुख है, तो सुख रे वास्ते दुःख क्यूं लेणो। जद बैठा बैठा ही मनोरथ सिद्ध व्हे' तो सन्दिग्ध कर्म क्यूं करणा, निश्चय ही करमओ। ज्यो सम्पूर्ण कामना सिद्ध व्हेवा शूं व्हेवे वो सूख, ने कामना त्याग सूं व्हेवे वो सुख मिलायो चावे, तो त्याग सूँ व्हेवे सो ही विशेष है

 

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