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राजस्थान रा जिला रो नक्शो
(आभार राजस्थान पत्रिका)

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डा. विमला भंडारी

राजस्थानी साहित संस्क्रति मांय
पर्यावरण चेतना

पर्यावरण रा खास घटक ईं जगत में जीव, जल अर बिरख होवै है। राजस्थान री संस्क्रति साहित अतरी जूनी अर समरध है क ईं तीनी विशया री विपुलता पे अेक परचो कई खोज खबर लेता ग्रंथ रचिया जाई सकै। पांणी रा आधार बादला-बरखा, नन्दी-नाळा, ताल-तलैया, सरवर, कूड़ा-बावड़ी जस्या विशया पे गद्य अर पद्य दोई विधा मांय रचिया थका साहित रो भंडार मिलै। राजस्थानी जीवन रो आधार पषु-पक्षी अर उण रे सागै परेम रा चितराम अठारी संस्क्रति री अेक खास ओलखाण भी है अर जिन्दगी ल्हारै यूं गूंथिया थका है क अणां ने मानव जीवन सूं विलग कर न देख भी नीं सका। ईंण परचा मांय चरचा खातर मैं केवल रूंख-बिरवा चुंणिया है।

हरियाला घेर घुमेर, फला सूं लड़ालूम रूंख सदीप सूं राजस्थानी साहित संस्क्रति रा सिरमौर रिया है।

आंगणा री क्यारी सूं ले’र गाम री गुवाड़ी रे चोवटा तांई, टाबरा ज्यूं उगता, परेम सूं सींचता-
बधता, जीव री जड़ी बण जिन्दगानी ल्हारै गुंथ ग्या ईं रूंखड़ा।

राजस्थानी संस्क्रति मांय रस घोळता गीत व्हे क गार, कामण व्हे क सेवरो, कैंणांवत व्हे क औंकाणा, वात व्हे क कांणिया, वरत-वास सगळा ही तो रूंख बिना अलूणां हैं।

लुगांया रा झुंड रा झुंड रूंखड़ा ने सरधा सूं पूजता ठाम ठाम नजरिया आवै। जरा कान लगान सुंणजो तो ईं री वाता। अे आपस मांय कई बखान करै?
‘‘क आ वात कठै सुंणी ?
क आ वात आंबा री डाल अर सरवर री पाळ सुंणी।’’
आंबा रो रूंख सखा भाव मांय साख देवा वालो बण जावै। कोरी साख रो ही भाव है क औज्यूं भी कई है? जाणनो छावो आप या री मानता अर सरधा? तो म्हूं ले चालू हूं आपने राजस्थान रे इतियास रा वीं गोखड़ा मांय जठे मंडी थकी है खेजड़ी री अमर गाथा।

खेजड़ी री अमर गाथा1

‘सिर साटे रूंख रहे तो भी सस्तो जांण’। आ कैंणावत कैवा वाला बिषनोई समाज रा जनमदाता जांभोजी तिरकाल अर्थात तष्ण, जल अर अन्न रो अकाल देख्यो हो। भादो बिद आठम अर्थात जन्माश्टमी रे दन संमत 1508 नागोर जिला रा पीपासार गाम मांय जनम लेवा वाला जांभोजी भूख प्यास सूं बिलखता टाबर देख्या हा। वणां कियो हो-
‘जीव दया पालणी रूंख लोलो नीं छावै।’ भाव यो है क वन रा जीवा ने मत मारो अर लीला बिरख मती काटो।
जांभोजी रे उनतीस नियमा ने पालवा वाळा मारवाड़ धरा री खेजड़ली गाम अर वंडे लारलां गामा रा लोग लुगाई संवत 1787 मांय खेजड़ी ने काटवा सूं बचावा खातर बळिदान दीदा। वे खुद कट मरिया पड़ रूंखड़ा ने नीं काटवा दीदा। आ घटना वीं बगत की है जद महाराजा अभयसिंघ मारवाड़ रा राजधिराज हा। जोधपुर मांय नुवों मै’ल चुंणावै। मै’ल खातर चूनो पाके अर चूनो पकावा लकडि़या बळै. जद राज रो हुक्म व्हियो क बळितो लावो तो लीला रूंख कटवा लाग्या। जद खेजड़ी पे कुल्हाड़ी रो वार उठियो तो अमष्तादेवी रूंख सूं लिपटगी। रोवा लागी, बोली- नीं काटवा दूं म्हारी खेजड़ळी।

अमष्ता देवी रे साथै वीं री तीनी बेटिया असु, रत्नी अर भगू भी मां रे लेरे खेजड़़ी सूं लिपटगी। हत्यारा कुला’ड़ा रा वार पे वार लागता ग्या अर लोया रा खैंगार व्हेता ग्या। मां बेटिया ल्हारै बीं बगत 363 बिश्नोईंया रा रूंख बचावा बळिदान व्हिया। कै जवान, बूढ़ा-ठाणा, लोग-लुगाया, परणिया-कुंवारा, अमीर-गरीब सगळा ही तो सीस चढ़ा दीदा खेजड़ी बचावा खातर। हे कोई आखा जगत मांय रूंख बचावो रो अस्यौ अेक भी उदाहरण?

आ राजस्थान री धरा ही है जठै खेजड़ी अर ऊंट विना रेगीस्तान सूनो लागै। खेजडी़ नीं व्हेती तो अठै जिनावर नीं व्हैता। तो अठै आदमी नीं बसतो। दूरां दूरां तांई सिरफ अर सिरफ बियाबन होतो। सूंसाट करतो वायरो बाजतो। मनखं री आंख्या दरखत जोवा तरस जाती। खेजड़ी तो सागै साग मरूधरा मांय वरदान है। जी रो बखान वेद पुराण करै। संस्क्रत मांय जिने ‘शमी’ केवै अर वनस्पति षास्त्री प्रोसोपिस सिनेदेरिया केवैं । आ खेजड़ी री छाया तो मनखं ने विसराम देवै।

मरूभूमि मांय छाया अर विसराम पे याद आवै है राजस्थानी भासा रा बढ़ऊ बिज्जी री कां’णी ‘दुनिया’ जी पे षाहरूख खान ‘पहेली’ फिल्म बणांई। जी लोग आ कां’णी भणी या सुंणी है, जी लोग आ पिक्चर देखी है वीं जाणै है क रूपाळी बिन्दड़ी खेजड़ी रे रूंख री छाया बैठ’र विसराम करै। वीं री दासिया भी लगती बैठी है। बिन्दणी घूंघटो उघाणै अर देखे पातली पातली अणगत लीली सांगरिया। वीं री आंख्या मांय ठण्डी लै’रा दौड़वा लागै। कां’णी आगै बदे। खेजड़ी मांय भूत रो वासो अर भूत रो बिन्दणी रे रूप पे लट्टू व्हेवा री गाथा चाल पड़ै। चावै तो ईं वात ने रोळ मांय ही लो आ खेजड़ी तो मनखं ने कई भूत ने भी ओसरो देवै है। ओ तो राजस्थान रो कल्पतरू है।

लोक आस्था सूं जुडिया बिरख:

राजस्थान रा मनखं पर्यावरण खातर हमेश सूं कित्ता सजग हा? हरमन चैहान रो लिख्यौ ‘पीपली’ नामक निबन्ध2 मांय संस्मरण अठे उदरथ है-

‘‘पोळ में के गुवाड़ी मांय, के चोवट्ठा मांय अेक पीपल रो रूंख अवस हुआ करतौ हो। काकोसा झूलणे लगाय दिया करता हा अर म्है उण झूलणा में सियाळो व्हो क उनाळो, हमेस झूलता रैवता हा। आखी गुवाड़ी री बेन-बूआसा अर काकियां-भाभियां नै दादियां तकात हींडौ खवाती ही। जद व्है सावण रा गीत हींडा माथै गावती ही, उण टैम ईंया लागतो हो कै उणारै सागै आखो पीपळ रो रूंख नाच रियो व्हे। म्हे टाबर जद कदैई पीपळ री डाळी तोड़ लेवता तो दादीसा रो मिजाज देखता ही बणतो हो। सावण रा गीत जद गाया जाता तो वायरा रे सागै पीपळ रा पानड़ा भी नाचण लागता। छोरा-छोरी सगळा नाचता अर म्हांकी बैना गावा लागती-

‘बधज्यौ रे बीरा बड़-पीपळ ज्यूं
फळज्यौ रे बीरा कड़वा नीम ज्यूं
वीरा फूलज्यौ रै फळज्यो पीपळ री डाळ ज्यूं...

गाम मांय कोई रै घर टाबर जलम लेवे तो पीपळ रा रूंख ज्यूं इज मान’र लुगायां गीत गावती ही-

‘हे म्हानै घणी अै सुहावै जच्चा पीपळी
हे म्हारे उत्तर-दखन री अे जच्चा पीपळी’

कदै-कदै काकीसा पीपळी माथै बैठोड़ा कागला ने कैवती-
‘लूठै पीपळ कागा तू बोलियो
देस पिया रे जाईज्यै रे...

काकियां-भाभियां उण पीपळ रा गौढ़ रै ओल्यूं-दोल्यूं आंटा लगावती अर लिपटती भी ही। पूजा भी करती, काचा सूत रो धागो भी पलेटती ही। पछै गावती-
‘बाय चाल्या भंवरजी पीपळी
हांजी ढ़ोळा व्हेगी घेर घुमेर

गीत मांय बखान करे है क पीपळी रो गोढ़ लगा’र पियाजी तो चाल्या परदेस। लारे पीपळ रूंख तो हरियो-भरियो खूब फैल ग्यो पण पियाजी हाल बावडि़या कोनीं। राता किंया सेजा पे काटूं? दोरा-सोरा दन तो पीपळ री छायां मांय कट जाय।’’

भारतीय जनमानस मांय पीपळ रो दरखत सदीप सूं पूज्यो ग्यो है। ग्रंथा मांय पीपळ री गिणती देवबिरख रे रूप में की जावै है-

पीपल पूजूं पान-पान, किषन मिलिया ठाम-ठाम.
पीपली मांय कठी षंकर तो कठी कृश्ण तो कठी विश्णु मान’र आज भी ठौर-ठौर पूजा की जावै है।3 राजस्थान रा मेवाड़ मांय तो होली रे दस दिन पीपली नीचे कांणिया केवै-सुंणै अर पछै आवै दशमी रे दन दषामाता रो तैंवार। लुगाईयां पीपळा री पूजा करै, कां’णिया कैवे, वरत करै।

बिरख पूजवा री परम्परा मांय देवबिरख बड़ळा रो भी घणों मान है। जेठ री अमावस रे दन लोग लुगाईयां बड़ळो पूजै। सुख सोभाग री कामना करै। वट सावित्री री कथा कैवे सुंणै।4
रूंख रे नाम पे पूरो तैंवार, वरत अर कथा तो राजस्थानी साहित संस्क्रति मांय दूध पांणी ज्यूं घुलिया मिलिया थका है। काती मास री नवमी आंवला नवमी या अक्खे नम आंवली री पूजा रो तैंवार है। जणीं लै’रे राजा चित्रसेन री कथा कैवे सुंणै।5 भदवा री तीज रे दन लीमड़ी री पूजन परम्परा जुड़ी थकी है। दूध मिलिया जल मांय लीमड़ी री डाळी देख’र वरत रो नै’म पूरो करै। गुरूवार रे दन कदली बिरख ने सींच’र पूजा धूप बाती करै। कैवा रो सार ओ है क राजस्थान री संस्क्रति मांय रूंख-बिरवा ने पूजवा री परम्परा ईंयान रची बसी है क परबात री शुरूआत तुलसी मांय जल सींचन सूं षुरू व्हेईन सिंज्या तुलसी क्यारे दीप जलावा सूं खतम व्हे।

राजस्थानीया रे ओ धरम भाव क रूंख मांय ईश्वर रो वासो व्हे। बिरख री पवित्रता ने करम भाव सूं जोड़’र कथा-गीत साहित रे विधान सूं पीढ़ी दर पीढ़ी दरखता रो महत्व री थापणा कर सदीप सूं सदीप तांई अणांने बोया, सींचिया, संजोया है अर कटाव सूं अभयदान दीदो है। खेजड़ी, पीपल, बड़, आंवला, आम, नीम अर तुलसी ने देवबिरख माननो, पूजनो, काटवा ने मा’पाप माननो ही राजस्थान री सांस्क्रतिक पर्यावरण चेतना है। जा राजस्थानी भासा रा साहित संसार मांय भांत-भांत सूं गुंथी थकी मिलै।

रूंख संग रिश्ता नाता री सौरमः

दोय डूंगरा बीच बेल पसरी
म्हारा बीरा रे आंगन आम्बो मोरियो
थे तो बदजो रे बीरा बड़ रे पीपल ज्यूं
फल जो थें कड़वा नीम जूं6

आस्था अर मानता री विरासत मांय हिया सूं उठती रिष्ता री सौरम रे सागै पर्यावरण रा बीज झांकता दिखै। आमली री आमल्या, आंबा री केरिया, नींबड़ी री नीबोळिया अर गुंदी री गूंदिया सगळा सूं तो नजीक रो घणापो है। अेक पल दन भी तो ईंण सूं विलग नीं रियो जावै। हरिया पोदीना रो यो गीत रो जायको छनेक आप भी लेवोसा।

ओ लुळ ओ झुक
ओ लुळ जाई रे हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
ओ तने सिल पे बटांऊ हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
क्यारियां में बाऊ केवड़ो
खेंतां में बाऊ हरियो पोदीनो
ओ लुळ जाई रे हरिया पोदीना
ओ झुक जाई रे हरिया पोदीना
माथा पे ल्याई केवड़ो
झोळी में ल्याई हरियो पोदीनो
सासूजी ने भावे केवड़ो
सुसराजी ने भावे हरियो पोदीनो7
जेठ-जेठानी, देवर-देवरानी सगळा ही रिष्ता ल्हारै पोदीनो अर केवडो गुंथ ग्यो। ओ कोरो गीत ही नीं है दोई बिरवा रे बीच रिष्ता री सोरम अठै महसूस की जाई सकै। बिरवा रा पाना-फूलड़ा ने लावा वाली मालणी मां सूं घणापो दीठ जोग है-

हरिया बाग को छाबुल्या गुथल्याई म्हारी मालण अे
ल्याय उतारी म्हारा बाबाजी री पोल्या अे
मंाय म्हारी उठ बोली, काई काई चीजा ल्यायाजी
चंपो चमेली मरवो केवड़ो बांदरवाळ ल्यायाजी
बांदरवाळ बंधाई जे म्हारी बाबाजी रे पोल्या अे

बिरवा रा फल-फूल रे सागै लगाव अस्यौ क जांणे जन्म जन्मांतर रो साथ व्हे-
बनाजी अंगूर का मै’ल चुनाय दो
पड़दा लगाय दो दाढ़म दाख का8

अचम्भौ तो उणं वैरा व्हे जद तुलसी री डोली बेटी ज्यूं घर सूं उठै। राजस्थान मांय तुलसी बिरवा बिना घर अपूरण रेवै। तुलसी घर रा सदस्य ज्यूं रेवै। हरेक शुभ मौका पे, तैंवारा पे तुलसी रा बिरवा ने चुंदड ओढ़ाई जावै। मेवाड़ मांय तो तुलसी ने बेटी ज्यूं राख्यौ जावै अर अेक दन घर सूं बेटी रे न्यान ही डोली पे विदा करै। तुलसी रो ब्याव बेटी ज्यूं व्हैव, मंडप सजे बस फरक अतरो है क बींद रे रूप मांय मंदर सू भगवान आवै।9

केंणावता-ओंकाणा में पिरोया रूंखः

राजस्थानी साहित केंणावता-ओंकाणा सूं गठियो थको हैं। बात-संवाद रो ढ़ंग ही अस्यौ क लक दक करती केंणावता-ओंकाणा चितराम उकेरवा रे साथै भासा री क्षमता चैगुनी कर देवै। जठै रूंम रूंम मांय बिरख परेम बसै सांसा री डोर ल्हारे रूंख वदे वठै केंणावता भी रूंख सूं अलूणी किस्तर छूटै। छनेक उदरण10

अ. सुकाळ में बेर काळ में कैर।
ब. केले की सी कामड़ी होली की सी झाल।
स. आम फलै नीचो नमे, अरंड आकासा जाय।
द. कांट कटीली झाखड़ी लागै मीठा बोर।
ओैंकाणा:
अ. कड़वी बेल री कड़वी तूमड़ी
अड़सठ तीरथ न्हाई
गंगा न्हाई, गोमती न्हाई।
मिटी नहीं कड़वाई
ब. बड़ सींचू बड़ोली सींचूं, सींचू बड़ की डाळी
राम झरोखै बैठकर सींचै सींचण वाळी
स. खोखा म्हानै चोखा लागै, खेजड़ली ज्यूं खजूर
निंबोळी-अंबोळी सिरखी, रस देवै भरपूर
द. बैठणो छाया मैं हुओ भलां कैर ही
रहणो भाया मैं हुओ भला बैर ही

इणं कैंणावता अर औंकाणा मांय जीवन रा द्रस्टान छिप्या हैं। जीवन रे अनुभव री कसौटी पर घिसता रूळता बणिंया अे कैंणावतां-औंकाणा मनख रे जिन्दगानी मांय रूंख रो वासो बताय है म्हानै।

सिंणगार, पूजन सामग्री मांय रूंख बिरवा:

सिंणगार अर पूजन सामग्री में बिरख-बिरवा-बेलड़ी रो तो मणी कांचन रो जोड़ है। माथा पे जल भरिया कलष अर मैं’दी राचिया हाथा मांय लीली धोबड़ी। लीली धोब, कनेर आकड़ा री डाली बाई तो आखा पाती ले’र चाली गारा री गणगौर पूजवा। पूजापा मांय पान सुपारी, मैंदी अर आंबा रा पाना अर गीत उगैरे है-

झटकन मेंहदी पटकन पान,
मेंहदी गई है राज दीवान
थे सूरज जी मेंहदी ल्यो,
मेहंदी ल्यो राणादे न द्यो।11

21 वीं सदी रे साहित री पर्यावरण चेतना:

ईंण परचा मांय पर्यावरण चेतना ने लेई’न जतरो भी लेखो जोखो हाळ तांई व्हियो है वो लोकसाहित, लोक आस्था अर परम्परा री तिरबेणी सूं भरी गंगाजली ही। जंडी अेक घूंट भी अमरत समान लाग री ही। पणं आज इक्कीसवीं सदी मांय दुनिया बदल गी है। वाता अर चाल चलन बदल ग्या है। आज प्रक्रति संजोवा री जिग्यां उजाड़वा रा दोहन होवा लाग्या है। राजस्थानी भासा रा सावचेत कलमकार आपणीं लेखणी सूं पर्यावरण चेतना ने उकेर अर उगेर रिया हैं। चेतना रा स्वर बदलिया थका है। रूंख बिरवा ल्हारै उमंग अर तरंग री जिग्यां चिंता रा बोल फूटवा लाग्या है। डाॅ. मंगत बादल रो कैर पे लिख्यो अेक लेख सूं थोड़ी बानगी आपरे खातर-

‘‘अगर कैर री लकड़ी इमारती या बालणै रे काम आवती होती तो स्वारथी मिनख इण री प्रजाति ने ई संकट में ल्या खड्यो करतो जियां फोगल, रोहिडै आद पर आज ओ खतरो मंडरावा लागर्यो है।’’ आज जणीं भांत पर्यावरण पे संकट गै’रा रियो है वीं री चिंता राजस्थानी कविया री रचना मांय भी नजरै आवा लागी है। हरीश व्यास री ईं कविता मांय -
दन दन सूखो बढ़ रियो
बरखा बैरण होय
जंगल कीदा साफ म्हां
अबै करनी पे रोय
अेक तरफ सूखो पडि़यो दूजे डाढ़ उफाण
प्रक्रति नीं छैणता
सुखी रैवतो इंसान
वष्क्षारोपण कर रिया
चोखो हे ओ काम
पौधा जिणं दन रूंख व्हे
तो सफल हुअ अभियान

21 वीं सदी मांय पर्यावरण चेतना अबै चिन्ता अर चिन्तन में बदल गी है। राजस्थानी भासा रा जांणियां मान्या सिरजनहार तारा लक्ष्मण बहलोत आपणीपौथी ‘‘केक्टस मांय तुलसी’’ में लिक्षै है-
लारला
दस बरसां सू
रोजीना
अखबार में वांचां के दस हजार रूंखडत्रा
कोई संस्था लगाया
तो अेक लाख रूंखड़ा कोई दूजी संस्था
लगाया ने
पर्यावरण रा रक्षण सांरू ईंण कविता मांय अंत में व्हे प्रगटे है बगत री कड़वी सच्चाई-
लारला
दस बरसा मांय
लगायोड़ा
ईंया रूंखड़ा रा
आंकड़ा तो जिला री जनसंख्या
सूं भी
घ्सणा
बधार हाक जावै।
तो कठी उपेन्द्र ‘अणु’ ‘बीती बात बिसार दे’ मांय टाबरा री पर्यावरण चेतना जाग्रत करता दीखै। अणीं कड़ी मांय औज्यूं भी नाम है। आशा रा अमर मोती ले’र पछै फैर औज्यूं चरचा करालां। हाळ तो सुधा आचार्य रे लरजता सुंर में म्हारा तांई पूग्या बना बनी रो आणंद लीजो सा आपने लीलीा रूंखडत्रा री सौगन्ध-
1. ओ तो आयौ आयौ बनासा रो गांव
चालो ए छोर्या देखणनै
आ तो नीमडै रे हेठे म्हारी बनड़ी ऊभी
म्हारै बनासा रे पूंपाड़ी बनाय
आपणी लेखनी मांय किरण राजपुरोहित नितिला भी आपणां भींज्या स्वर में केवै है-
मोवणी धरती
नीलो आभो
जठै गळै मिळै
हरियाळी चादरै
ज्यूं जडि़यो
इक मोती
वो म्हारो घर!
चिड़कलियां चैचावे
कोयल कुहुकै
मोर हरखावै
काचो कंवळो वायरो
किवाड़ खड़कावै
म्हारो अहदो घर!
ईं परचा ने त्यार करवा मांय राजस्थानी भासा री पत्रिका कुरजां, मरूधर, घूमर, जागती जोत, माणक रे लहारै, व्रत री कथावा, मंगल गीत सरिता, राजस्थानी रा ब्लाॅग सूं लीदी सामग्री आधार बणीं। आ तो कोरी लोक मानता अर आस्था री गठरी संभाली है। राजस्थानी भासा री छपी गद्य पद्य री पुस्तका मांय बिखरियो इन्दरजाल तो अतरो भरियो है क अेक पोथी अलग सूं बण जाय।

संदर्भ सूची:

1. खेजड़ी रेगीस्तान की शान, लेख - अशोक राही
2. घूमर, मई-जून 2011, पष्. 31
3. नारी लोक आस्था में पर्यावरण संरक्षण, लेख - विमला भंडारी
4. व्रत री कथावां, ले. प. विनोद बिहारी याज्ञिक
5. वहीं
6. घूमर, वहीं
7. मरूधर, मार्च-अप्रेल 2011
8. मंगल गीत सरिता, पष्. 101
9. बेटी की तरह उठती है तुलसी की डोली, ले. मीरा सिंह
10. राजस्थानी कहावते
11. मंगल गीत सरिता


जनमगांठ रा गुलाबजामुन

बाणनै ऊं आती मिठाईयां री बा’ना ऊं डोकरी रो मन राजी व्हेई ग्यो. आज तो घर में तरै तरै रा पकवान बणिया है, आ वा’ना तो गुलाबजामुन री है - डोकरी जोर ऊं सांस लीदी अर डोकरी रे मुंडा में पाणी भर आयो. वा मन-ई-मन सोचवा लागी - ‘आज तो म्हनै भी गुलाबजामुन खावा मिलैगा. घणा दन व्हेई ग्या गुलाबजामुन खादा नै. कंई करां मैंगारत रो जमानो है. पैलां तो जदी मन पड़ती कसना रा बाऊजी मावो लेई आवता ने म्हूं कतरा बढि़या गुलाबजामुन वणांती. मुंडा में रख्या न गपाक. कस्या नरम-नरम चासणी रा तर गुलाबजामुन.’
पण वीं टेम भी वा भरपेट गुलाबजामुन कठै खाई पाती. सगळौ काम निपट न खावा बैठती तो छोरा-छोरी आई न ऊबा व्हेई जावता, न वा वंडी पांती रा गुलाबजामुन वणां ने वांटी देवती. किसना रा बापू देखता तो कैवता -‘‘अरे, थां खाइलौ किसना री मां ! ई छोरा-छोरी तो घणां ई खाता रै’ई, आखी उमर पड़ी है अणां री खावा वास्ते.’’
‘‘थां भी कंई वातां करौ! छोरा-छोरी ऊबा देखता रेवै न गुलाबजामुन म्हारै गळा ऊं किस्तर नीचे उतरै. म्हारै गला में ही अटक जावै.’’
पुराणी वातां याद करतां-करतां सांझ व्हेईगी. सगळा मिनख जीमवा आवा लाग्या. आज डोकरी रे पोता री जनमगांठ री गोठ ही. मिनख जीमी रिह्या है न वणां ने मनवार कर-कर न बेटा बऊ परूस रिह्या है -‘‘थोड़ासा ई दहीबड़ा लेईलौ. व्हा ये गुलाबजामुन तो जीमो.’’
डोकरी रे पेट में भूख कुळबुलावा लागी. मन-ही-मन सोचवा लागी कि आज तो म्हनै जरूर जीमवा ने मिलेगा. नीं तो ईं बऊवा मीठो तो म्हनै नामेक भी नीं देवै. कैवे -‘‘थांने हजम नीं व्हेगा न दस्तां लाग जावेगा तो म्हां किस्तर अवेरांगां?’’ पण आज तो पिंट्या री जनमगांठ है. बारलां सगळा मिनख जीम रिह्या है तो कई घर में बूढ़ी डोकरी ने टाल देगा? पण कई बात है? - वंडे हिवड़ा में हूक उठी - हाल तक अठीने कोई परबात ऊं नीं आयो? दूसरे ही छण सोचवा लागी - घर में घणों काम है भूली ग्या व्हेगा. यूं करूं कि म्हूं हीज उठी व्हेईन बाणनै परी जाऊ. म्हनै देखीन वणां ने गत पड़ी जाई कि हाल डोकरी भूखी है.
डोकरी उठवा री कौशिश कीदी. घणी मुश्किल ऊं उठी व्हेवा लागी, पण कई करै नीं उठाणौ. यो बुढ़ापो घणौ बेरी है. जवानी मेंवा कस्यौ कंदोरो कमर में लटकाईन आखा घर में छमछमाती फरती. पण अबै तो दो डग भरना मुश्किल व्हेई ग्या है. ज्यूं-त्यूं ई हरकती-हरकती डोकरी ड्योढ़ी रे बाणने आई. चोखट पकड़ी न ऊबी व्हेवा लागी के जोरदार घन्नाटो आयो न डोकरी रो डील धगधग धूजवा लाग्यो. धम्म करती डोकरी नीचे पड़ीगी. ‘‘कुंड़ पडि़यो? कुंण पडि़यो?’’ बेटा बऊ दौडि़या दौडि़या आया.
‘‘यो कंई बाई? थन्नै कतरी दांण नट्यो कि बाणनै मती आया कर. थ्हारै चावै जो हेला पाड़ लिया कर.’’ किसनो डोकरी ने तोकतो थको कैई रिह्यो हो.
‘‘कंई वात नीं बेटा म्हूं तो यूं ही.....’’
‘‘अणां ने तो हूतां बैठा जक नीं.’’ नानकी बिन्दणी मुंडो मचकौड़ी न बोली.
मोटकी बऊ कैवा लागी - ‘‘बुढ़ापा में हाड़कियाटूटी जावैगा तो कुंण सेवा चाकरी करी ईं?’’
नानकियो बेटो कैवा लाग्यो - ‘‘छानीमानी हूती रै बाई बारळां मिनखां ने जीमावा देव.’’ कोई कई कैवे न कोई कई, पण कणीं यूं नीं कियो कि डोकरी परबात री भूखी है. भूखा-भूखा कठी नींद आवै? सगळा बारळां मिनखां रे जीमवा री चिन्ता करै. घर में बूढ़ी मां सूती है, पण कनै ई ध्यान नीं. बाणनै जाईन घणी बेईज्जती कराई डोकरी रो मन भूख न बेईज्जती ऊं दुखी व्हेई ग्यो. डोकरी रो स्वाभिमान बोल्यो - ‘‘ क्यूं नीं मन बस में राख्यो? क्यूं बाणनै गी? अक दन नीं खावती तो कई मरी तो नीं जावती. क्यूं म्हारो मन खावा वास्ते मरवा लाग्यो? बुढ़ापा में म्हारी मति मारीगी’ पण दूसरे ही पळ वंडे हिवड़े में बैठी मां कैवा लागी - छोरा-छोरी ने वणां रो काम करवा देव. सब परां जाई न पछै घणां ई जीमाई. मनवार कर-कर न मोटको किसनियो कैवेगा -‘‘बाई! ई गुलाबजामुन खाई लै, थनै घणां भावै..’ नानकियो केवेगा- ‘ले दईबड़ा खाई ले. थ्हारो मूंछो साफ व्हेई जावेगा.’
मिनख रे साम्मै कतरो ही अणचेत्यो क्यूं नीं व्हेवै, पण वो विश्वास रे सहारे जीवतो रेवै. डोकरी मन में आशा रो दीप जलाया छानीमानी पड़ी री. मिनख आया न जीमीन परा ग्या. बाणनै बेटाबऊ जीम रिह्या है. हंसी ठिठोली करी रिह्या है. पकवाना रा चटखारा उड़ी रिह्या है.
‘‘आखा दन रा भूखा म्हारा बेटा बऊ काम करता करता थाकी ग्या व्हेगा. दुजूई म्हूं वणां रे जीमवा पछे जीमती.’’ डोकरी रे हिवड़ा में बैठी मां रो पलड़ो भारी हो. स्वाभिमाान री उठी हूक जड़ व्हईगी.
पण यो कंई! सगळा जणां खाई पीन आपा-प रे कमरा में परा ग्या. म्हारो कन्नै ई ध्यान नीं आयो? विश्वास रो काचो धागो टूटी ग्यौ. बुढ़ापा री परवशता वंडी लाचारी आंखा में पाणी रो रेलो बण छूटी ग्यौ.आंसू री धार ऊं तकियो भींजवा लाग्यो. वाह! रे भगवान थ्हारी माया भी निराली है. बारळा सगळा जीमी ग्या न घर धरियाणी परबस डोकरी आज पोता री जनमगांठ री धामधीम में भूखी ही सूती रैईगी.
डोकरी ने भूखा-भूखा नींद नीं आवै. अतराक में बाणनो खुल्यौ. डोकरी खुद ने धिक्कारवा लागी -‘म्हूं भी कसी हूं जो कई रा कई विचार करूं. म्हारा बेटा बऊ म्हने भूखी राखेलां? भला किसना ने नानकिया ने नींद आवैलां? म्हारा बेटा म्हारे वास्ते पकवाना री थाल सजाईन लाया है. अबै म्हने मनवारा करी करी न जीमाईं. पण यो कई? यो तो पिंट्यो है. दादी रे पां आईन हुई ग्यो. डोकरी रे आंसू ऊं भींज्या सींराता पे माथे पड़ता ही बोल्यो - ‘‘का बाई थ्हारो तकियो आलो है, पांणी ढ़ुळ ग्यौ कई?’’
डोकरी कई कैती? मन घणौं ढ़ाबियो पण रोज फूटी ग्यो.
‘‘बाई थूं क्यूं रावै है? थ्हारै कईं व्हियो? पिंटू पूछवा लाग्यौ.
‘‘बेटा नींद नीं आवै. बुढ़ापा में आ नींद भी बैरण व्हेईगी है.
बुढ़ापा री वात पिंट्या री बाळबुद्धि में कई आवती. वो तो गुलाबजामुन रे स्वाद ने जाणंतो - ‘‘बाई! आज तो म्हे घणां गुलाबजामुन खादा. सब जणां मुंडा में जबरदस्ती ठूंसी दीदा.’’
डोकरी ने नीं रैवायो, पूछियो - ‘‘का बेटा! गुलाबजामुन कस्या बणिया?’’
‘‘बाई थें नीं खादा कईं म्हारी जनमगांठ रा गुलाबजामुन? म्हूं थ्हारै वास्ते लेईंन आऊं.’’ अर पिंटू तो रपट पडि़यो बाई रे वास्ते गुलाबजामुन लावा खातर. धीरेकऊं रसोड़ो खोल्यो. छनैकऊं गुलाबजामुन लेईन पिंटू निकलियौ, पण वच में रखी पाणी री गिलास वंडी ठोकर खाईन झनझनाई पड़ी.
पापा-मम्मी दौडि़या-दौडि़या आया. लाईट जलाईन देख्यो - ‘‘यो कई पिंटू? गुलाबजामुन कठै लेई जाई रिह्यो है?’’
पण पिंटू कई नीं बोल्यौ. पापा कान मरोड़ न कैवा लाग्या ‘‘अतरो खावा मिलै तोई छानेक ऊं खावै. मंगतो मरे. चाल मैल. रात पडि़या खाई तो कठी मांदो व्हेई जाई. काले दन नीं ऊगी कईं,’’
पापा रे कान मरोड़वा ऊं पिंट्या री रूलाई फूट पड़ी. बेटा ने रोवतो देखीन मां बाप ऊं लड़वा लागी - ‘‘जनमगांठ रे दन कई छोरा ने लड़ो. खैलवा कूदवा में नीं खादो व्हेगा. ले आ बेटा, खाईले थ्हारै जतरा भी गुलाबजामुन खाणां व्हेवै.’’
‘‘पापा मम्मी म्हारो तो पेट भरियो थको है म्हनै तो नीं भावै.’’
‘‘तो पछे थूं अठै कईं करी रियो हो मंगता?’’
दरद न गुस्सा ऊं पिंटू बिफर पडि़यो - ‘‘मम्मी ! आज म्हारी जनमगांठ रे दन थे बाई ने गुलाबजामुन क्यूं नीं दीदा? थे हगळा ने जीमाया पण आपणी बाई भूखी हूती है.’’
पिंटू री बात सुंण न मम्मी पापा रो हिवड़ौ धक्क रैईग्यो.... मां बेटा ने छाती ऊं लगाई लीदो. - ‘‘ओह! आज म्हाणां ऊं कस्यो अनरथ व्हेई जावतो. बेटा थूं नीं चेतातो तो घणो पाप व्हेई जातौ.’’
नानकियो बेटो अफसोस करतो डोकरी रे पां दौडि़यो. बऊआ तो मारै शरम रे जमीन में गड़ी जाई री ही. अणी घर री धरियाणी, म्हाणै सायब री जामण म्हाणी सासूमां आज भूखी रैयगी.
बेटबऊ जाईन डोकरी रे पगै पडि़या -‘‘बाई म्हनै माफ करी दौ. म्हाणाऊं भूल व्हेईगी.’’
नानकी बऊ भोजन री थाळ सजाईन लाई. बेटाबऊ मनवार ऊं डोकरी री आंखाऊं आंसू री लड़ी झड़वा लागी न मुंडाऊं आर्शीवाद फूट्यो - ‘‘जुग-जुग जीवौ म्हारी काळजा री कोर. थ्हाणै पूतड़ळा री वेळ वदै.’’


डा. विमला भंडारी हिन्दी एवं राजस्थानी की स्थापित लेखिका है। उन्होंने बालसाहित्य और किशोर साहित्य के अलावा इतिहास लेखन में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है। उनकी पुस्तक ‘सलूम्बर का इतिहास’ को इतिहास की प्रमाणित पुस्तक की मान्यता मिली है। प्रस्तुत कृति ‘अणमोल भेंट’ किशोर कथाओं (बालकथा भी कह सकते हैं) का संग्रह है। इस संग्र्रह में ग्यारह कहानियां है। इनमें किसी कहानी का शीर्षक अणमोल भेंट नहीं है। सभी कहानियां ही अणमोल हैं। ‘आ धरती मीठा मोरा री’ कहानी में संस्कृतियों में टकराव है। भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ों ने धनसंपन्न अमेरिकी संस्कृति को झुकने को मजबूर कर दिया है। इस कहानी की एक और विशेषता भी है कि यह पंजाबी भाषी परिवार पर आधारित है। यह उस राष्ट्रीय एकता का स्वर भी है कि एक प्रांत में दूसरे प्रांत से लोगों को पराया या बाहरी न समझा जाए। कुछ कहानियां यथा ‘उदैपुर री सैर’ और ‘समझग्यो स्टीफ न’ कहानी के साथ ही यात्रा संस्मरण का आनन्द भी देती है और बुजुर्गों का सम्मान क रना भी सिखाती हैै। ‘जस जसो नाम’ आविष्कार की कहानी सुनाती है। हां,  इस कहानी में ‘अध्यापिका जी’ सम्बोधन हिन्दी में होते हुए भी न हिन्दी का लगा न राजस्थानी का। यहां किताबी भाषा से बचना चाहिए था। ‘मुसीबत संू मुकाबलों’ साहस और धैर्य रखने की शिक्षा देती है तो ‘वाह रे दीनू’ पर्यावरण रक्षा का संदेश दे रही है। ‘रामी आखां’ में शराब का तांडव है। जो लोग चाहते है कि उनके बच्चे शराब के अभिशाप से दूर रहें उन्हें पहले खुद को उससे दूर रहने का तप करना होगा। मेरे विचार में इन कहानियों की भाषा और विषय वस्तु किशोरों की अपेक्षा बालपाठकों के नजदीक ुहै। पुस्तक का कवर और चित्रांकन आकर्षक है।  राजस्थानी पाठकों को एक सुदर कथा संग्रह मिला है, इसलिए उन्हें और लेखिका को हार्दिक बधाई। वस्तु है। पुस्तक का कवर और चित्रांकन आकर्षक है।  राजस्थानी पाठकों को एक सुदर कथा संग्रह मिला। 

राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर ने वर्ष 2012-13 के लिए
विभिन्न पुरस्कारों की घोषणा कर दी  है । गुरूवार को अकादमी अध्यक्ष श्याम
महर्षि ने विभिन्न पुरस्कारों के निर्णायकों की संस्तुतियों के आधार पर अकादमी
मुख्यालय में पुरस्कार निर्णयों की जानकारी दी । इस वर्ष का
राजस्थानी बाल साहित्यकार पुरस्कार सलूम्बर(उदयपुर) की डॉ. विमला भण्डारी को
उनकी बाल साहित्य की पुस्तक ‘अनमोल भेंट’  के लिए 
  31 हजार रूपये के दिया जाएगा ।

‎"अणमोल भेंट" पुस्तक का राज्यपाल ने किया लोकार्पण :
सलूम्बर, डाॅ. विमला भंडारी द्वारा राजस्थानी भाषा में लिखी किशोर कथा संग्रह ‘‘अणमोल भेंट का लोाकार्पण राजस्था

  न की राज्यपाल मारग्रेट अल्वा ने यहां स्थानीय आदिवासी बालिका छात्रावास में किया। पंचायत एवं जनजाति मंत्री महेन्द्रजीतसिंह मालवीय, सलूम्बर विधायक बसंती देवी मीणा, सलूम्बर प्रधान शांता शांता मीणा के सानिध्य में हुए इस लोकार्पण पर किशोरों के लिए साहित्य रचना को लेकर राज्यपाल ने प्रसन्नता व्यक्त की। 
स्थानीय भाषा में लिखा जाना इस पुस्तक पहली विशेषता एवं उपयोगिता है। जिसमें लिखे कथानको में महापुरूषों के बारे में, ज्ञान-विज्ञान, पर्यावरण एवं पर्यटन जैसे विषयों को कहानी का आधार बना बच्चों को ज्ञान देने की कोशिश है। यह पुस्तक बालकों के लिए उपयोगी रहेगी। विमला भंडारी बालसाहित्य हमेशा सोद्देशय रहा है।

इसके अलावा "सलूम्बर का इतिहास" पुस्तक भी उनके द्वारा महामहिमराज्यपाल को भेंट किया गया।


Vimla Bhandari
Bhandari Sadan
Palace road
SALUMBER-313027

Raj-INDIA
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आस रे थांबे आसमान टिक्योडो ।