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(आभार राजस्थान पत्रिका)

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श्री मधुकर गौङ री राजस्थानी गजला

श्री मधुकर गौङ गत चालीस वर्षों से हिन्दी भाषा में गीत रच रहे हैं। अपनी मायङ भाषा के लिए भी उनके दिल में छंदमयी वैतरणी हिलोरे लेती नजर आती है,जिसकी बानगी है उनकी राजस्थानी छंदों की विभिन्न प्रकाशित पुस्तकें। दर्जनों साहित्यिक पुरस्कारों से विभूषित एवं 10 अक्टूबर 1942 को राजस्थान के चूरू जिले में जन्में गौङ मुंबई में रहकर भी मायङ भाषा की सेवा में रत है।

1.बिनममतारोकिसङोजीवण

मायङ री आंख्यां मिळ ज्यावै
आसूं रा फुलङा खिल ज्यावै
बिन ममता रो किसङो जीवण
सपना रो मोती छुळ ज्यावै
मां री आंख्यां री अगनी नै
देखै तो धरती हिल ज्यावै
जद मायङ री आंख पसीजै
घावां रा मूंढा सिल ज्यावै
आंख्यां री ममता पाकर तो
जीवण नै जीवण मिल ज्यावै

2.तदबैरणरातढळैकोनी


अब आंख्यां नींद पळै कोनी
मनङै री जोत जळै कोनी
आंख्यां रो समदर सूक गयो
अब नैणां नीर ढळै कोनी
मन में यादां री उठै हूक
अब सुपना सांच फळै कोनी
आंख्यां पे जद पौहरा लागै
आंख्यां री दाळ गळै कोनी
जद आंख्यां नींद उचट जावै
तद बैरण रात ढळै कोनी
आंख्यां नै आंख्यां जद भूलै
पीङा री पीङ गळै कोनी

पं.
मधुकरगौङ
1/302,
ब्ल्यू एम्पायर काम्पलेक्स,
महावीर नगर, कांदिवली (प.)
मुंबई-400067
कानाबाती-022 28600652
प्रस्तुति:राजबिजारणियां

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