आपाणो राजस्थान
AAPANO RAJASTHAN
AAPANO RAJASTHAN
धरती धोरा री धरती मगरा री धरती चंबल री धरती मीरा री धरती वीरा री
AAPANO RAJASTHAN

आपाणो राजस्थान री वेबसाइट रो Logo

राजस्थान रा जिला रो नक्शो
(आभार राजस्थान पत्रिका)

News Home Gallery FAQ Feedback Contact Help
आपाणो राजस्थान
राजस्थानी भाषा
मोडिया लिपि
पांडुलिपिया
राजस्थानी व्याकरण
साहित्यिक-सांस्कृतिक कोश
भाषा संबंधी कवितावां
इंटरनेट पर राजस्थानी
राजस्थानी ऐस.ऐम.ऐस
विद्वाना रा विचार
राजस्थानी भाषा कार्यक्रम
साहित्यकार
प्रवासी साहित्यकार
किताबा री सूची
संस्थाया अर संघ
बाबा रामदेवजी
गोगाजी चौहान
वीर तेजाजी
रावल मल्लिनाथजी
मेहाजी मांगलिया
हड़बूजी सांखला
पाबूजी
देवजी
सिद्धपुरुष खेमा बाबा
आलमजी
केसरिया कंवर
बभूतौ सिद्ध
संत पीपाजी
जोगिराज जालंधरनाथ
भगत धन्नौ
संत कूबाजी
जीण माता
रूपांदे
करनी माता
आई माता
माजीसा राणी भटियाणी
मीराबाई
महाराणा प्रताप
पन्नाधाय
ठा.केसरीसिंह बारहठ
बप्पा रावल
बादल व गोरा
बिहारीमल
चन्द्र सखी
दादू
दुर्गादास
हाडी राणी
जयमल अर पत्ता
जोरावर सिंह बारहठ
महाराणा कुम्भा
कमलावती
कविवर व्रिंद
महाराणा लाखा
रानी लीलावती
मालदेव राठौड
पद्मिनी रानी
पृथ्वीसिंह
पृथ्वीराज कवि
प्रताप सिंह बारहठ
राणा रतनसिंह
राणा सांगा
अमरसिंह राठौड
रामसिंह राठौड
अजयपाल जी
राव प्रतापसिंह जी
सूरजमल जी
राव बीकाजी
चित्रांगद मौर्यजी
डूंगरसिंह जी
गंगासिंह जी
जनमेजय जी
राव जोधाजी
सवाई जयसिंहजी
भाटी जैसलजी
खिज्र खां जी
किशनसिंह जी राठौड
महारावल प्रतापसिंहजी
रतनसिंहजी
सूरतसिंहजी
सरदार सिंह जी
सुजानसिंहजी
उम्मेदसिंह जी
उदयसिंह जी
मेजर शैतानसिंह
सागरमल गोपा
अर्जुनलाल सेठी
रामचन्द्र नन्दवाना
जलवायु
जिला
ग़ाँव
तालुका
ढ़ाणियाँ
जनसंख्या
वीर योद्धा
महापुरुष
किला
ऐतिहासिक युद्ध
स्वतन्त्रता संग्राम
वीरा री वाता
धार्मिक स्थान
धर्म - सम्प्रदाय
मेले
सांस्कृतिक संस्थान
रामायण
राजस्थानी व्रत-कथायां
राजस्थानी भजन
भाषा
व्याकरण
लोकग़ीत
लोकनाटय
चित्रकला
मूर्तिकला
स्थापत्यकला
कहावता
दूहा
कविता
वेशभूषा
जातियाँ
तीज- तेवार
शादी-ब्याह
काचँ करियावर
ब्याव रा कार्ड्स
व्यापार-व्यापारी
प्राकृतिक संसाधन
उद्यम- उद्यमी
राजस्थानी वातां
कहाणियां
राजस्थानी गजला
टुणकला
हंसीकावां
हास्य कवितावां
पहेलियां
गळगचिया
टाबरां री पोथी
टाबरा री कहाणियां
टाबरां रा गीत
टाबरां री कवितावां
वेबसाइट वास्ते मिली चिट्ठियां री सूची
राजस्थानी भाषा रे ब्लोग
राजस्थानी भाषा री दूजी वेबसाईटा

राजेन्द्रसिंह बारहठ
देव कोठारी
सत्यनारायण सोनी
पद्मचंदजी मेहता
भवनलालजी
रवि पुरोहितजी

मायड भाषा में शिक्षा


राजस्थानी में हो शुरुआती पढ़ाई
भास्कर समाचार शनिवार, 10 अप्रेल, 2010

विभिन्न अंचलों से. अनिवार्य शिक्षा कानून में कहा गया है कि प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों को मातृभाषा में ही पढ़ाना होगा। इससे प्रदेश के भाषाविदों में नई बहस छिड़ गई है। दैनिक भास्कर ने प्रदेश भर में शुक्रवार को टॉक शो कराए।

इनमें सभी ने एक स्वर में कहा- राज्य के 90 लाख बच्चों की शुरुआती पढ़ाई राजस्थानी भाषा में ही होनी चाहिए। वक्ताओं ने कहा- बच्चों को समझाने के लिए मातृभाषा सहज माध्यम होती है। मुद्दा यह भी उठा कि जिस मातृभाषा में पढ़ाई की बात हो रही है उसे मान्यता क्यों नहीं है? कवि कन्हैयालाल सेठिया की ये पंक्तियां आज सही मालूम होती है-

खाली धड़ री कद हुवै, चेहरे बिन पिछाण, राजस्थानी रै बिनां,क्यां रो राजस्थान।

यानी राजस्थानी भाषा के बिना कैसा राजस्थान? जयपुर में हुए टॉक शो में विद्वानों ने कहा कि बच्चों को सबसे पहले वही भाषा सिखानी चाहिए जिसके वह सबसे नजदीक हो। शुरुआती शिक्षा राजस्थानी में देने में कोई हर्ज नहीं है और इसके लिए मान्यता की भी जरूरत नहीं है। विद्वानों का तर्क था कि प्रदेश में तीन विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा पढ़ाई जाती है और आरपीएससी इस भाषा के व्याख्याताओं की भर्तियां करता है फिर स्कूल में यह क्यों नहीं शुरू हो सकती।

कोटा में वक्ताओं का मानना था कि राजस्थानियों के लिए मायड़ भाषा, भावनाओं को समझने का सबसे सशक्त माध्यम है। जोधपुर में लोगों का मत था कि राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता मिलनी ही चाहिए। मातृभाषा में शुरुआती पढ़ाई के साथ ही राजस्थानी, हिन्दी और अंग्रेजी की त्रिस्तरीय शिक्षण व्यवस्था को भी लागू करने की जरूरत है।

अनिवार्य शिक्षा कानून के अनुच्छेद 29 के प्रावधान को लागू करने से पहले खासकर राजस्थान के संदर्भ में ंमातृभाषाा शब्द की समुचित व्याख्या आवश्यक है। अजमेर के साहित्यकारों ने अनिवार्य शिक्षा कानून के तहत राज्य में प्राथमिक स्तर पर राजस्थानी में ही शिक्षा देने पर बल दिया है। शिक्षा मंत्री मास्टर भंवरलाल की इस बात पर कड़ी आलोचना की है कि राजस्थान की मातृभाषा फिलहाल हिन्दी है।

सभी ने एक मत से यह मांग रखी कि अनिवार्य शिक्षा और प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने संबंधी विधेयक के अनुच्छेद 29 की पूरी तरह पालना हो। प्रमुख राजस्थानी साहित्यकार चंद्रप्रकाश देवल ने कहा कि मातृभाषा वह है जिसमें दूध पीता बच्चा अपनी मां के साथ संवाद करता है। उन्होंने कहा कि राज्य के 90 लाख बच्चे प्राथमिक स्तर पर राजस्थानी में पढ़ने के अधिकार से वंचित किए जाने के कारण ही आधी से ज्यादा संख्या में निरक्षर हैं। अनुच्छेद में यह कहीं नहीं लिखा है कि प्राथमिक शिक्षा के लिए मातृ भाषा का संवैधानिक अनुसूची में होना जरूरी है।

मेवाड़ और वागड़ अंचल के साहित्यकारों, शिक्षाविदों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि शिक्षा का माध्यम प्रारंभिक स्तर से ही मातृभाषा का हो, हमारी मातृभाषा राजस्थानी है जो दुनिया की सर्वाधिक समृद्ध भाषओं में से एक है। यदि शिक्षामंत्री यह कहते हैं कि फिलहाल मातृभाषा हिंदी है तो उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि मां और मातृभाषा स्थायी होती है, यहां कोई ईफिलहालल का प्रावधान नहीं होता।

वोट मायड़ भाषा में तो अधिकार क्यों नहीं

बीकानेर के विद्वानों का भी मत है कि मातृभाषा बच्च मां की कोख से सीखकर आता है और उसी भाषा में वह चीजों को बेहतर तरीके से जान-समझ सकता है। ऐसे में राजस्थान के बच्चों की प्राथमिक शिक्षा का माध्यम मायड़ भाषा राजस्थानी ही होना चाहिए।

साहित्यकारों ने सवाल उठाया कि सभी नेता वोट मांगते समय गांवों में जाकर राजस्थानी में बात करते हैं मगर बाद में इसे भुला बैठते हैं, यह ठीक नहीं है। साहित्यकारों का कहना है, हिन्दी सम्मानीय है, राजभाषा है मगर मायड़ भाषा तो राजस्थानी ही है। देश के दूसरे हिस्सों में जब अपनी मातृभाषा में पढ़ने की आजादी है तो फिर राजस्थान में ऐसा क्यों नहीं।

सीकर के शिक्षाविदें की राय इस मायने में अलग रही कि बच्चों को हिंदी भाषा में ही पढ़ाना चाहिए क्योंकि जब वे पढ़ाई करके दूसरे राज्यों में जाएंगे तो उन्हें भाषा को लेकर परेशानी नहीं होगी। हालांकि शिक्षाविदों व साहित्यकारों ने राजस्थानी को संवैधानिक मंजूरी की वकालत भी की।

शिक्षा का माध्यम राजस्थानी हो, हिंदी के साथ
दैनिक भास्कर, श्रीगंगानगर, अप्रेल 22, 2010

मायड़ भाषा की मिठास का हो अहसास
श्रीगंगानगर. टॉक शो में आए भाषा एवं शिक्षा से जुड़े लोगों की इस बात पर एक राय थी कि किसी भी भाषा का अपमान नहीं होना चाहिए। भाषाओं में वैर की भावना न हो और सब एक-दूसरे की भाषा का सम्मान करते हुए आगे बढें़। उस भाषा को प्राथमिकता दें जिससे जीवन में आगे बढऩे की संभावनाएं हों और जो व्यक्ति को उसकी संस्कृति और सभ्यता से परिचित कराती हो। हमारी कोशिश रहे कि राजस्थानी को मान्यता मिले ताकि मायड़ भाषा की मिठास का अहसास प्राथमिक शिक्षा के साथ ही होने लगे। शिक्षक इस जिम्मेदारी को गंभीरता से संभाले। प्रारंभ में दैनिक भास्कर के डिप्टी एडिटर सुधीर मिश्र ने टॉक शो के उद्देश्य एवं उपयोगिता के बारे में बताया।

जो भाषा दे रोजगार - जो भाषा रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए, वही शिक्षा का माध्यम होनी चाहिए। मातृभाषा को न भूलें मगर हम हिंदी-अंग्रेजी नहीं जानेंगे तो देश-दुनिया से कैसे जुड़ पाएंगे?
संदेश त्यागी, कवि

सहजता से सीखें - सीखने का माध्यम वही हो जो सहजता से आ जाए। हम जिस भाषा को माध्यम बना रहे हैं, उसकी उपादेयता क्या है, इसको भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है।
अनूप कटारिया, संस्कृत व्याख्याता

मां की लोरी वाली भाषा - जिस भाषा में बाा अपनी मां से लोरी सुनता है,वही उसकी शिक्षा का माध्यम हो क्योंकि पहला विद्यालय परिवार ही होता है। मातृभाषा माध्यम होगा तो बाा जल्दी सीखेगा।
अलीमोहम्मद परिहार, सेवानिवृत्त व्याख्याता अंगे्‌रजी

भाषा बिगाड़ते हैं हम - प्रादेशिक भाषा का ज्ञान होना चाहिए लेकिन उसके साथ हमारा राष्ट्रभाषा एवं अंतरराष्ट्रीय भाषा के प्रति भी अनुराग कम न हो। अमूमन हमारी क्षेत्रीय भाषा का प्रभाव हर जगह हावी रहता है। इससे भाषा बिगड़ती है।
गीता गुप्ता, संस्कृत व्याख्याता

मातृभाषा है हिंदी - प्राथमिक शिक्षा का माध्यम नि:संदेह मातृभाषा होनी चाहिए परंतु राजस्थान में तो मातृभाषा हिंदी ही है। ऐसे में यह कार्य हिंदी में ही हो तो बेहतर रहेगा। हिंदी में सीखने वाले बो को बाद में दिक्कत नहीं आएगी।
पूनम झांब, व्याख्याता हिंदी

राजस्थानी हो विषय - बाा काी मिट्टी के समान होता है। ऐसे में उसे जो उसे सिखाएंगे, वही सीख जाएगा। मातृभाषा तो समय के साथ उसे आ ही जाती है। वैश्वीकरण के दौर में आज हिंदी और अंग्रेजी के महत्व को समझना होगा। हां, राजस्थानी को एक विषय के रूप में पहली कक्षा से ही पढ़ाया जा सकता है।
विनोद शर्मा, व्याख्याता संस्कृत

बों की रुचि पर छोड़ो - सारी भाषाएं समान हैं। मातृभाषा बाा स्वत: ही सीख जाता है। प्रदेश से बाहर उसे हिंदी और देश से बाहर अंग्रेजी की जरूरत होती है। जहां तक प्राथमिक शिक्षा की बात है तो बो की रुचि को ध्यान में रखकर इसका निर्णय करना चाहिए।
वर्षा रॉकविल, चेयरपर्सन, रॉकविल कॉन्वेंट स्कूल

जो आसानी से समझ आए - शिक्षा का माध्यम भाषा हो, जो आसानी से समझ आए। अगर राजस्थानी को मान्यता मिलेगी तो इसमें रोजगार के साधन बढ़ेंगे। अकेले राजस्थानी के अध्यापक ही अढ़ाई लाख लग जाएंगे।
कृष्ण वृहस्पति, कवि

राजस्थानी भाषा को पहला दर्जा जरूरी - हिंदी और अंग्रेजी या फिर अन्य भाषा सीखने की ललक सभी राजस्थानियों को है, किंतु राजस्थानी भाषा को पहले स्थान पर दर्जा देकर ही यह संभव है। जिस भाषा के आदिकाल से हिंदी साहित्य आज हर्षित है, वही अब तक उपेक्षा की शिकार है।
नीरज दइया, साहित्यकार सूरतगढ़

राजस्थान की मातृभाषा राजस्थानी -ा्राजस्थान में तो मातृभाषा राजस्थानी ही मानी गई है और मातृभाषा भाव प्रधान होती है। शिक्षा या ज्ञान की कोई भी विषय वस्तु भावात्मक रूप से बड़ी सरलता से आत्मसात की जा सकती है।
महेंद्रसिंह शेखावत, व्याख्याता सूरतगढ़

त्रिभाषा फार्मूला लागू है देश में - शिक्षा के लिए देश में त्रिभाषा फार्मूला लागू है। राजस्थान की मातृ भाषा राजस्थानी, राष्ट्रभाषा है हिंदी और अंतरराष्ट्रीय भाषा है अंग्रेजी। इस सूत्र को आधार मानकर ही राजस्थान में प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा दिया जा सकता है।
मनोज स्वामी, साहित्यकार सूरतगढ़

राजस्थानी एक समृद्ध भाषा - ा्राजस्थानी एक समृद्ध भाषा है। राज्य में प्रत्येक स्थान पर राजस्थानी भाषा का ही अधिक प्रचलन है। प्राथमिक शिक्षा का कार्य मातृभाषा में ही होना चाहिए, क्योंकि मातृभाषा बिल्कुल घर की भाषा होती है।
नंदकिशोर सोमानी, व्याख्याता सूरतगढ़

राजस्थानी नहीं सिखाई तो आएगी परेशानी - ा्राजस्थान में अधिकांश राजस्थानी भाषा का ही प्रयोग हो रहा है व राजस्थानी राजस्थान का गौरव है, यदि बो को प्रारंभ से ही मातृ भाषा नहीं सिखाई गई तो आने वाले समय में उसे परेशानी आ सकती है। वह अपने भावों को पूर्ण रूप से प्रस्तुत नहीं कर पाएगा व अपनी पारंपरिक संस्कृति से दूर होता चला जाएगा। मातृभाषा के माध्यम से बो को संस्कारवान बनाया जा सकता है।
हरीश शर्मा साहित्यकार

राजस्थान में राजस्थानी ही हो शिक्षा का माध्यम
प्रस्तुतकर्ता - आपणी भाषा आपणी बात
गुरूवार, अप्रेल 8, 2010

गलती सुधारने का सुनहरा अवसर
गांधी जी के शब्द- 'जो बालक अपनी मातृभाषा के बजाय दूसरी भाषा
में शिक्षा प्राप्त करते हैं, वे आत्महत्या ही करते हैं।' -सत्यनारायण सोनी

त्रिगुण सेन कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार प्रारम्भिक शिक्षा मातृभाषा के माध्यम से ही होनी चाहिए। दूसरी ओर राजस्थान के शिक्षा मंत्री मास्टर भंवरलाल का बचकाना बयान अखबारों में प्रकाशित हुआ है कि फिलहाल राज्य में हिन्दी ही मातृभाषा है। जबकि मां हमें जिस भाषा में दुलारती है, लोरियां सुनाती है, जिस भाषा के संस्कार पाकर हम पलते-बढ़ते हैं, वही हमारी मातृभाषा होती है। मंत्री महोदय के बयान पर तरस आता है और बरबस ही उनके लिए कुछ सवाल जेहन में खड़े हो जाते हैं। माननीय मंत्री महोदय भी इसी राज्य के हैं। क्या उनकी मातृभाषा हिन्दी है? क्या उन्होंने अपनी मां से हिन्दी भाषा में लोरियां सुनीं। हिन्दी में ही उनके घर पर विवाह आदि उत्सवों के गीत गाए जाते हैं? हिन्दी में ही वे वोट मांगते हैं? जनता से संवाद हिन्दी में करते हैं? जिस महानुभव को महज इतना-सा अनुभव नहीं, उन्हें राजस्थान के शिक्षा मंत्री बने रहने का कोई हक नहीं।

आजादी के पश्चात राजस्थान में शिक्षा के माध्यम के सम्बन्ध में जो गलत निर्णय हुआ उस गलती को सुधारने का अब एक सुनहरा अवसर आया है और राजस्थान की सरकार अगर गांधीजी के विचारों का तनिक भी सम्मान करती है तो प्रदेश में तत्काल मातृभाषा के माध्यम से अनिवार्य शिक्षा का नियम लागू कर देना चाहिए। राजस्थान के शिक्षा-नीति-निर्धारकों को गांधीजी के इन विचारों पर अमल करना चाहिए- 'शिक्षा का माध्यम तो एकदम और हर हालत में बदला जाना चाहिए, और प्रांतीय भाषाओं को उनका वाजिब स्थान मिलना चाहिए। यह जो काबिले-सजा बर्बादी रोज-ब-रोज हो रही है, इसके बजाय तो अस्थाई रूप से अव्यवस्था हो जाना भी मैं पसंद करूंगा।' अपने व्यक्तिगत अनुभव से गांधीजी को यह पक्का विश्वास हो गया था कि शिक्षा जब तक बालक को मातृभाषा के माध्यम से नहीं दी जाती, तब तक बालक की शक्तियों का पूरा विकास करने और उसे अपने समाज के जीवन में पूरी तरह सहयोग देने लायक बनाने का अपना हेतु भलीभांति सिद्ध नहीं कर पाती। भारत कुमारप्पा के संपादन में गांधीजी के विचारों पर आधारित 'शिक्षा का माध्यम' नामक पुस्तिका में उनके शब्द हैं, 'मातृभाषा मनुष्य के विकास के लिए उतनी ही स्वाभाविक है जितना छोटे बच्चे के शरीर के विकास के लिए मां का दूध। बच्चा अपना पहला पाठ अपनी मां से ही सीखता है। इसलिए मैं बच्चों के मानसिक विकास के लिए उन पर मां की भाषा को छोड़कर दूसरी कोई भाषा लादना मातृभूमि के प्रति पाप समझता हूं।' गांधीजी को इस बात का मलाल रहा कि उन्हें प्राथमिक शिक्षा अपनी मातृभाषा गुजराती में नहीं मिली। उन्होंने लिखा कि जितना गणित, रेखागणित, बीजगणित, रसायन शास्त्र और ज्योतिष सीखने में उन्हें चार साल लगे, अंग्रेजी के बजाय गुजराती में पढ़ा होता तो उतना एक ही एक साल में आसानी से सीख लिया होता। यही नहीं गांधीजी ने माना कि गुजराती माध्यम से पढऩे पर उनका गुजराती का शब्दज्ञान समृद्ध हो गया होता और उस ज्ञान का अपने घर में उपयोग किया होता। गांधीजी ने स्पष्ट कहा कि मातृभाषा के अलावा अन्य माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने वाले बालक और उसके कुटुम्बियों के बीच एक अगम्य खाई निर्मित हो जाती है। 'हरिजन सेवक' और 'यंग इंडिया' नामक पत्रों में गांधीजी ने इस मुद्दे को लेकर अनेक लेख लिखे। मातृभाषा को उन्होंने जीवनदायिनी कहा और उसके सम्मान के लिए हर-सम्भव प्रयास की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा- 'मेरी मातृभाषा में कितनी ही खामियां क्यों न हो, मैं उससे उसी तरह चिपटा रहूंगा, जिस तरह अपनी मां की छाती से। वही मुझे जीवन प्रदान करने वाला दूध दे सकती है।'

प्राथमिक शिक्षा मायड़भाषा में दिए जाने की मांग - डॉ. राजेन्द्र बारहठ, सत्यनारायण सोनी

प्राथमिक शिक्षा मायड़भाषा में दिए जाने की मांग - डॉ. राजेन्द्र बारहठ, सत्यनारायण सोनी

राजस्थानी मोट्यार परिषद के कार्यकर्ताओं ने की मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मुलाकात। ज्ञापन सौंपा।
प्रदेश के शिक्षक संगठन भी हुए इस मसले पर सक्रिय।

जयपुर। महात्मा गांधी ने कहा था'मातृभाषा मनुष्य के विकास के लिए उतनी ही स्वाभाविक है जितना छोटे बच्चे के शरीर के विकास के लिए मां का दूध। बच्चा अपना पहला पाठ अपनी मां से ही सीखता है। इसलिए मैं बच्चों के मानसिक विकास के लिए उन पर मां की भाषा को छोड़कर दूसरी कोई भाषा लादना मातृभूमि के प्रति पाप समझता हूं। मेरा यह विश्वास है कि राष्ट्र के जो बालक अपनी मातृभाषा के बजाय दूसरी भाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं, वे आत्महत्या ही करते हैं।'

देश में ही नहीं दुनियाभर में गांधीजी के इन विचारों का सम्मान होता है और सब जगह मातृभाषाएं ही प्राथमिक शिक्षा का माध्यम है। मगर इसके विपरीत प्रदेश की गांधीवादी सरकार इस मसले पर मौन साधे हुए है। मंगलवार को शिक्षा संकुल में राज्य के शिक्षा अधिकारियों की बैठक लेने के लिए प्रस्थान करने से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से उनके निवास पर अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति की युवा शाखा राजस्थानी मोट्यार परिषद के एक शिष्टमंडल ने जयपुर देहात इकाई के जिला पाटवी बृजमोहन बैनीवाल की अगुवाई में भेंट की तथा इस आशय का ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में लिखा गया है कि अनिवार्य शिक्षा कानून में मायड़भाषा में प्राथमिक शिक्षा देने का प्रावधान है तथा इसी तरह त्रिगुण सेन समिति एवं यूएनओ की शिक्षा समितियों की रिपोर्टों के अनुसार पूरी दुनिया में प्राथमिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा है। परन्तु राजस्थान इसका अपवाद है। यहां के बच्चों को अपने जन्म से लेकर स्कूल पहुंचने तक मायड़भाषा का जो ज्ञान होता है, वह स्कूल पहुंचने पर पीट-पीटकर छुड़वाया जाता है। जो कि मानवाधिकारों एवं प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। ज्ञापन में यह भी लिखा गया है कि प्राथमिक शिक्षा मायड़भाषा में नहीं होने से राजस्थान के बच्चों का स्वाभाविक विकास अवरुद्ध हो रहा है और बच्चे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटते जा रहे हैं।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने युवकों की पीठ थपथपाई तथा प्रसन्नता व्यक्त की कि युवा पीढ़ी अपनी मायड़भाषा व संस्कृति के प्रति जागरुकता का प्रदर्शन कर रही है। मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर गम्भीरता से विचार-विमर्श करने तथा राज्य सरकार की ओर से राजस्थानी भाषा व संस्‌कृति के सम्मान हेतु ठोस कदम उठाए जाने का आश्वासन दिया।

दूसरी ओर राज्य के शिक्षक संगठन भी मायड़भाषा के माध्यम से शिक्षा दिए जाने पर बल देने लगे हैं। राजस्थान शिक्षक संघ प्रगतिशील के प्रदेशाध्यक्ष हनुमान प्रसाद शर्मा ने मंगलवार को इस आशय का ज्ञापन मुख्यमंत्री को भेजा है। ज्ञापन में लिखा गया है कि राजस्थानी एक बहुत ही समृद्ध और विशाल समुदाय की मातृभाषा है तथा यह बड़ी विडम्बक स्थिति है कि आज राजस्थान का विद्यार्थी अपने ही प्रांत की गौरवशाली भाषा और संस्कृति के ज्ञान से अनभिज्ञ है। आजादी के पश्चात राजस्थान में शिक्षा के माध्यम के सम्बन्ध में जो गलत निर्णय हुआ उस गलती को सुधारने का अब एक सुनहरा अवसर आया है और राजस्थान की सरकार अगर गांधीजी के विचारों का तनिक भी सम्मान करती है तो प्रदेश में तत्काल मातृभाषा राजस्थानी के माध्यम से अनिवार्य शिक्षा का नियम लागू कर देना चाहिए।
इस समाचार की पेज मेकर फाइल भी अटैच है..

प्रेषक : डॉ. राजेन्द्र बारहठ, प्रदेश महामंत्री, अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति।
कानाबाती : 9829566084
सत्यनारायण सोनी, प्रदेश मंत्री, अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति।
कानाबाती : 9602412124

 

 आपाणो राजस्थान
Download Hindi Fonts

राजस्थानी भाषा नें
मान्यता वास्ते प्रयास
राजस्तानी संघर्ष समिति
प्रेस नोट्स
स्वामी विवेकानद
अन्य
ओळख द्वैमासिक
कल्चर साप्ताहिक
कानिया मानिया कुर्र त्रैमासिक
गणपत
गवरजा मासिक
गुणज्ञान
चौकसी पाक्षिक
जलते दीप दैनिक
जागती जोत मासिक
जय श्री बालाजी
झुणझुणीयो
टाबर टोली पाक्षिक
तनिमा मासिक
तुमुल तुफानी साप्ताहिक
देस-दिसावर मासिक
नैणसी मासिक
नेगचार
प्रभात केसरी साप्ताहिक
बाल वाटिका मासिक
बिणजारो
माणक मासिक
मायड रो हेलो
युगपक्ष दैनिक
राजस्थली त्रैमासिक
राजस्थान उद्घोष
राजस्थानी गंगा त्रैमासिक
राजस्थानी चिराग
राष्ट्रोत्थान सार पाक्षिक लाडली भैंण
लूर
लोकमत दैनिक
वरदा
समाचार सफर पाक्षिक
सूरतगढ़ टाईम्स पाक्षिक
शेखावटी बोध
महिमा भीखण री

पर्यावरण
पानी रो उपयोग
भवन निर्माण कला
नया विज्ञान नई टेक्नोलोजी
विकास की सम्भावनाएं
इतिहास
राजनीति
विज्ञान
शिक्षा में योगदान
भारत रा युद्धा में राजस्थान रो योगदान
खानपान
प्रसिद्ध मिठाईयां
मौसम रे अनुसार खान -पान
विश्वविद्यालय
इंजिन्यिरिग कालेज
शिक्षा बोर्ड
प्राथमिक शिक्षा
राजस्थानी फिल्मा
हिन्दी फिल्मा में राजस्थान रो योगदान

सेटेलाइट ऊ लीदो थको
राजस्थान रो फोटो

राजस्थान रा सूरमा
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
आप भला तो जगभलो नीतरं भलो न कोय ।

आस रे थांबे आसमान टिक्योडो ।