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(आभार राजस्थान पत्रिका)

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रोजगार में प्राथमिकता

राजस्थानी विद्यार्थियों को नौकरियों में प्राथमिकता की मांग
प्रस्तुत कर्त्ता (प्रमोद कुमार सोनी, हनुमानगढ़)

राजस्थानी विद्यार्थी लामबद्ध। अन्य प्रांतों की सरकारी नौकरियों में मातृभाषा का ज्ञान अनिवार्य शर्त। राजस्थान में राजस्थानी भाषा ज्ञान को अहमियत क्यों नहीं? स्कूलों में राजस्थानी अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाए। राजस्थानी शिक्षकों की भर्तियां की जाएं।

हनुमानगढ़. (प्रमोद कुमार सोनी). मातृभाषा राजस्थानी छात्र मोर्चा के प्रदेश संयोजक गौरीशंकर निम्मिवाल ने राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पत्र भेजकर राजस्थानी विद्यार्थियों को राजस्थान की सरकारी सेवाओं में प्राथमिकता देने की मांग की है। निम्मीवाल के अनुसार मुख्यमंत्री के नाम पत्र भेजने का सिलसिला जोर पकड़ता जा रहा है तथा प्रदेश के राजस्थानी विद्यार्थी इस मसले पर लामबद्ध हो रहे हैं।

पत्र में लिखा गया है कि राजस्थानी राजस्थान के जन-जन की भाषा है तथा राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति का ज्ञान रखने वाले कर्मचारी व अधिकारी ही राजस्थान की जनता की बेहतर सेवा एवं अध्ययन-अध्यापन तथा शोध-सृजन करने में सक्षम हैं। क्योंकि जनता के दु:ख-दर्द को वे ही बेहतर समझ सकते हैं तथा उनसे उनकी ही भाषा में लिखित व मौखिक संवाद कर सकते हैं।
निम्मीवाल के अनुसार वर्षों से राज्य में ग्यारहवीं से लेकर एम.ए. तक की पढ़ाई राजस्थानी विषय में हो रही है तथा लाखों की संख्या में विद्यार्थी इस विषय का अध्ययन कर चुके हैं और कर रहे हैं। राजस्थानी में शोध कर चुके व करने वाले तथा इस विषय में यूजीसी की जेआरएफ, एसआरएफ, पीडीएफ, 'नेट' व आरपीएससी की 'स्लेट' परीक्षा उत्तीर्ण कर चुकी प्रतिभाओं की तादाद भी सैकड़ों में है।

राजस्थानी पढ़े-लिखे लोगों के लिए राजस्थान प्रांत की ही सरकारी सेवाओं में कोई अवसर नहीं है, जबकि अमरीका सरकार की नौकरियों तक में राजस्थानी के ज्ञान को अहमियत है तथा देश के लगभग हर प्रांत में वहां की प्रांतीय भाषा पढ़ चुके अभ्यर्थियों को प्राथमिकता ही नहीं, प्रांतीय भाषा का अध्ययन अनिवार्य शर्त भी है। उदाहरणार्थ- गुजरात में गुजराती, महाराष्ट्र में मराठी, पंजाब में पंजाबी, आंध्र प्रदेश में तेलुगु, अरुणाचल प्रदेश में असमिया, गोआ में कोंकणी, कर्नाटका में कन्नड़, केरल में मलयालम, मणिपुर में मणिपुरी, उड़ीसा में उडिय़ा, सिक्किम में नेपाली, तमिलनाडु में तमिल तथा प. बंगाल में बंगाली पढ़े लोग ही राज्य की सरकारी सेवाओं के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके विपरीत राजस्थान में राजस्थानी पढ़े-लिखे लोग दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। इस उपेक्षा के बावजूद भी प्रतिवर्ष हजारों की तादाद में विद्यार्थी इस विषय का अध्ययन करते हैं तो यह उनका निजी स्वार्थ नहीं, मायड़ भाषा प्रेम ही है।

मुख्यमंत्री से मोर्चा कार्यकर्ताओं ने आग्रह किया है कि राजस्थानी भाषा व संस्कृति के जानकार लोगों को राजस्थान राज्य की सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जाए। साथ ही एस.टी.सी. व बी.एड के पाठ्यक्रमों में राजस्थानी को अनिवार्य शिक्षण विषय के रूप में शामिल किया जाए तथा राज्य की प्राथमिक शिक्षा में राजस्थानी को माध्यम बनाया जाए। इसी प्रकार कक्षा 6 से 10 तक राजस्थानी को तृतीय भाषा विषय के रूप में लागू किया जाए तथा प्रत्येक प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालय में तृतीय श्रेणी राजस्थानी शिक्षक तथा प्रत्येक माध्यमिक व उच्च माध्यमिक विद्यालय में द्वितीय श्रेणी राजस्थानी शिक्षक की नियुक्ति की जाए। प्रदेश के जिन विश्वविद्यालयों में राजस्थानी विषय स्वीकृत नहीं है वहां तत्काल स्वीकृत किए जाएं तथा विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में रिक्त पड़े राजस्थानी व्याख्याताओं के पद शीघ्र भरे जाएं।

राजस्थान लोक सेवा आयोग की प्रतियोगी परीक्षाओं में भी राजस्थानी को एक ऐच्छिक व अनिवार्य विषय बनाया जाए एवं संघ लोक सेवा आयोग की प्रतियोगी परीक्षाओं व रेलवे भर्ती परीक्षाओं में राजस्थानी को एक विषय के रूप में जुड़वाने का मार्ग प्रशस्त करवाया जाए। साथ ही राजस्‌थान लोक सेवा आयोग की 'सेट' परीक्षा में राजस्थानी विषय को पुन: शामिल किया जाने की मांग भी पत्र में शामिल है।

पत्र में लिखा गया है कि राजस्थानी राजस्थान की पहचान है तथा इस पहचान को कायम रखने में राजस्थानी के विद्यार्थियों की अहम भूमिका है। इसलिए इन विद्यार्थियों के लिए राज्य सरकार की ओर से वजीफे की विशेष व्यवस्था भी की जानी चाहिए। निम्मीवाल ने राजस्थानी के प्रत्येक विद्यार्थी से मुख्यमंत्री के नाम पत्र भेजने का आह्वान किया है।

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